कवर्धा/धनंजय साहू/ ब्यूरो चीफ/
छत्तीसगढ़ की राजनीति में एक ऐसा विवाद उभरकर सामने आया है, जिसने समाज और सत्ता के बीच के नाज़ुक संतुलन को चुनौती दे दी है। चर्चा का केंद्र है पूर्व विधानसभा अध्यक्ष धरमलाल कौशिक के गृह जिले बिलासपुर और वहां के प्रमुख समाज कुर्मी समुदाय की सरकारी पदों और संस्थागत प्रतिनिधित्व से पूरी तरह अनदेखी।जानकारी के अनुसार, विष्णु देव साय सरकार बनने के बाद हुए विभिन्न नियुक्तियों में कुर्मी समाज को किसी भी निगम, मंडल, आयोग, बोर्ड या मंडी समिति में जगह नहीं मिली है। यह स्थिति स्थानीय राजनीति और सामाजिक संगठन में गहरा असंतोष पैदा कर रही है।राजनीतिक और सामाजिक जानकारों का कहना है कि कुर्मी समाज छत्तीसगढ़ में चुनावी रूप से निर्णायक भूमिका निभाता है। चाहे विधानसभा चुनाव हो या स्थानीय निकाय चुनाव, कुर्मी वोट बैंक हमेशा से भाजपा के लिए महत्वपूर्ण माना गया है। इसके बावजूद सत्ता में आने के बाद भी कुर्मी समाज को कोई प्रतिनिधित्व नहीं दिया जाना स्थानीय लोगों के लिए आश्चर्य और नाराज़गी का कारण बना है।स्थानीय सामाजिक संगठन और कुर्मी नेताओं का कहना है कि यह सिर्फ एक व्यक्ति या पद की बात नहीं, बल्कि पूरी समुदाय की उपेक्षा का मामला है। नेताओं का मानना है कि यह कदम राजनीतिक दृष्टिकोण से गलत संदेश दे रहा है और इससे जनता के बीच सरकार की छवि पर असर पड़ सकता है।राजनीतिज्ञों का कहना है कि छत्तीसगढ़ की राजनीति में सामाजिक संतुलन केवल दिखावा नहीं बल्कि सत्ता की नींव है। जब किसी प्रमुख समाज को शासन के महत्वपूर्ण पदों में प्रतिनिधित्व नहीं दिया जाता, तो यह नाराज़गी और अविश्वास पैदा कर सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि इस असंतोष को समय रहते नहीं सुधारा गया, तो यह आने वाले पंचायत, निगम और विधानसभा चुनावों में भाजपा के लिए चुनौती बन सकता है। कुर्मी समाज की भूमिका को नजरअंदाज करना राजनीतिक नुकसान में बदल सकता है।विष्णु देव साय सरकार ने अभी तक इस मामले पर कोई स्पष्ट टिप्पणी नहीं दी है। सरकार के अंदरूनी सूत्र यह कहते हैं कि नियुक्तियां “संतुलन और अनुभव” के आधार पर की जाती हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या इस संतुलन में बिलासपुर का कुर्मी समाज कुल मिलाकर ही शामिल नहीं किया गया? स्थानीय राजनीतिक पर्यवेक्षक कहते हैं कि यह केवल पदों की बात नहीं है, बल्कि सामाजिक न्याय और राजनीतिक हिस्सेदारी का मुद्दा बन गया है। अगर कुर्मी समाज की नाराज़गी को गंभीरता से नहीं लिया गया, तो आने वाले समय में इसका असर केवल बिलासपुर तक ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे प्रदेश में दिख सकता है।इस मुद्दे ने सिर्फ स्थानीय राजनीति में हलचल पैदा नहीं की है, बल्कि यह सत्ता, समाज और लोकतंत्र के बीच संतुलन का भी सवाल खड़ा कर दिया है। अब यह देखना बाकी है कि क्या विष्णु देव साय सरकार कुर्मी समाज की इस नाराज़गी और उपेक्षा को समझेगी, या बिलासपुर के कुर्मी अपने हक के लिए लंबे समय तक प्रतीक्षा करते रहेंगे। एक बात तय है कि इस मुद्दे की अनदेखी से केवल राजनीतिक नुकसान ही नहीं होगा, बल्कि यह छत्तीसगढ़ की सामाजिक-सांस्कृतिक सामंजस्य पर भी गहरा असर डाल सकता है।