तरुण कौशिक/ संपादक सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ की प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में इन दिनों एक युवा आईएफएस अधिकारी को लेकर जबरदस्त हलचल है। विभागीय सूत्रों के अनुसार, यह अधिकारी खुलेआम अपने कनिष्ठ कर्मचारियों के सामने ऐसे बयान देता फिर रहा है, मानो प्रदेश की सत्ता उसी के इशारों पर चलती हो।कथित तौर पर यह तक कहा जा रहा है कि “पांच साल मुख्यमंत्री कौन रहेगा, यह कोई तय नहीं है” जो न सिर्फ संवैधानिक मर्यादाओं पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि निर्वाचित सरकार की गरिमा को भी चुनौती देता है।सबसे गंभीर पहलू यह है कि वन विभाग से जुड़े बड़े-बड़े घोटालों पर कार्रवाई को लेकर मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की भूमिका पर भी सवाल उठने लगे हैं।प्रशासनिक सूत्रों और राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि क्या मुख्यमंत्री इन घोटालों पर सख्त कार्रवाई करने में सक्षम हैं, या फिर अफसरशाही के दबाव में निर्णय प्रक्रिया ठप पड़ गई है?प्रदेश में यह सवाल अब आम हो चला है कि, क्या छत्तीसगढ़ में नीति सरकार तय कर रही है या कुछ अफसर?क्या वन विभाग में सामने आए कथित घोटालों पर कार्रवाई की फाइलें जानबूझकर रोकी जा रही हैं?और क्या एक युवा आईएफएस अधिकारी को इतना खुला संरक्षण मिला हुआ है कि वह सत्ता की समय-सीमा तक तय करने की बातें करने लगा है?राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि ऐसे कथित बयान और घटनाएं सच हैं, तो यह केवल प्रशासनिक अनुशासन का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की जड़ों पर चोट है।अब निगाहें मुख्यमंत्री विष्णु देव साय पर टिकी हैं , क्या वे अफसरशाही को उसकी संवैधानिक सीमा में रख पाएंगे, या फिर यह संदेश जाएगा कि छत्तीसगढ़ में सरकार नहीं, घोटालों और अफसरों का राज चल रहा है?