तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ की सियासत में इन दिनों सत्ताधारी भाजपा के भीतर ही असंतोष की आंच तेज़ होती दिख रही है। महीनों बीत जाने के बावजूद संसदीय सचिवों की नियुक्ति न होने से भाजपा विधायकों में गहरा आक्रोश है। अंदरखाने यह नाराज़गी अब खुलकर चर्चा का विषय बन चुकी है और कई विधायक अपनी ही सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठा रहे हैं।विधायकों का कहना है कि चुनावी मैदान में जनता से किए गए वादों और विकास कार्यों को गति देने के लिए संसदीय सचिवों की भूमिका अहम होती है, लेकिन नियुक्ति टलते रहने से न सिर्फ कामकाज प्रभावित हो रहा है, बल्कि कार्यकर्ताओं में भी गलत संदेश जा रहा है। संगठन और सरकार के बीच समन्वय की कमी का खामियाज़ा जमीनी स्तर पर भुगतना पड़ रहा है।सूत्रों के अनुसार, कई विधायक यह महसूस कर रहे हैं कि सत्ता में होने के बावजूद उन्हें निर्णय प्रक्रिया से दूर रखा जा रहा है। जिम्मेदारी और अधिकारों के बिना उनसे परिणामों की अपेक्षा की जा रही है, जो व्यावहारिक नहीं है। यही कारण है कि असंतोष अब दबा नहीं रह पा रहा।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि समय रहते संसदीय सचिवों की नियुक्ति पर निर्णय नहीं लिया गया, तो यह असंतोष सरकार की छवि और संगठनात्मक अनुशासन दोनों के लिए चुनौती बन सकता है। विपक्ष पहले से ही इस मुद्दे को हथियार बनाकर सरकार को घेरने की तैयारी में है।अब बड़ा सवाल यह है कि क्या नेतृत्व विधायकों की नाराज़गी को गंभीरता से लेकर जल्द फैसला करेगा, या फिर यह अंदरूनी असंतोष आगे चलकर खुली बगावत का रूप ले लेगा? सत्ता के गलियारों में इसी सवाल की गूंज है।