शोर से दूर, काम में अव्वल: मुख्यमंत्री कार्यालय की रीढ़ बने सुबोध कुमार सिंह और पी. दयानंद।

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तरुण कौशिक/ संपादक सर्वव्यापी/

छत्तीसगढ़ की प्रशासनिक व्यवस्था इन दिनों जिस संतुलन, स्थिरता और अनुशासन के साथ आगे बढ़ती दिख रही है, उसके केंद्र में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के दो भरोसेमंद स्तंभ-प्रमुख सचिव सुबोध कुमार सिंह और सचिव पी. दयानंद की सशक्त और निस्वार्थ भूमिका स्पष्ट रूप से उभरती है। राजनीतिक शोर, आरोप-प्रत्यारोप और दबावों के बीच मुख्यमंत्री कार्यालय का सुचारु संचालन आसान नहीं होता, लेकिन इन्हीं परिस्थितियों में इन दोनों वरिष्ठ अधिकारियों ने बिना किसी दिखावे के प्रशासनिक मर्यादाओं को मजबूत किया है।प्रमुख सचिव सुबोध कुमार सिंह का प्रशासनिक व्यक्तित्व अनुभव, संवैधानिक समझ और संतुलित निर्णय क्षमता का प्रतीक माना जाता है। वे न तो जल्दबाज़ी में फैसले लेते हैं और न ही दबाव में झुकते हैं। नीति, प्रक्रिया और जनहित इन तीनों के बीच संतुलन बनाकर मुख्यमंत्री को निष्पक्ष और व्यवहारिक सलाह देना उनकी पहचान है। विभागों के बीच समन्वय, फाइलों की सूक्ष्म समीक्षा और निर्णयों की वैधानिक मजबूती, हर स्तर पर उनकी पकड़ प्रशासनिक गलियारों में स्वीकार्य है। यही कारण है कि मुख्यमंत्री कार्यालय में निर्णय प्रक्रिया अपेक्षाकृत स्पष्ट, सुव्यवस्थित और विवादमुक्त दिखाई देती है।वहीं सचिव पी. दयानंद अपनी परिणामोन्मुख कार्यशैली के लिए जाने जाते हैं। वे उन अफसरों में गिने जाते हैं जो कम बोलते हैं लेकिन ज़मीन पर काम का असर दिखाते हैं। योजनाओं के क्रियान्वयन, समयबद्ध निगरानी और विभागीय अनुशासन में उनकी दक्षता ने कई जटिल मामलों को अनावश्यक टकराव से बचाया है। उनकी कार्यसंस्कृति यह संदेश देती है कि सत्ता का असली अर्थ आदेश देना नहीं, बल्कि जवाबदेही के साथ काम को अंजाम तक पहुँचाना है।राजनीति और प्रशासन के बीच संतुलन साधना किसी भी सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती होती है। ऐसे समय में सुबोध कुमार सिंह और पी. दयानंद जैसे अधिकारी यह साबित करते हैं कि प्रशासन यदि पेशेवर और ईमानदार हाथों में हो, तो व्यवस्था स्वयं स्थिर रहती है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की कार्यशैली में जो संयम, धैर्य और संतुलन दिखता है, उसके पीछे इन वरिष्ठ अधिकारियों की सतर्क सलाह और संस्थागत समझ की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता।प्रशासनिक सूत्रों का कहना है कि दोनों अधिकारी संवाद से परहेज़ नहीं, बल्कि सार्थक संवाद के पक्षधर हैं, शर्त यह कि सवाल व्यवस्था सुधार और जनहित से जुड़े हों। यही दृष्टिकोण उन्हें अफसरशाही की भीड़ में अलग पहचान देता है। आज जब अफसरों पर अक्सर संदेह की निगाह डाली जाती है, तब ये दोनों नाम भरोसे के रूप में सामने आते हैं।


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