तरुण कौशिक/ संपादक सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ के गौरव और राज्य पशु बाघ की सुरक्षा को लेकर किए जा रहे दावों की पोल एक बार फिर अचानकमार टाइगर रिजर्व (ATR) में खुलती नजर आ रही है। यहां दो वर्षीय बाघ की मौत को वन विभाग ने सामान्य “आपसी संघर्ष” बताकर मामले को रफा-दफा करने की कोशिश की, लेकिन घटनाक्रम, परिस्थितियां और ज़मीनी हकीकत इस कहानी को पूरी तरह कटघरे में खड़ा करती है।यह घटना वन ग्राम जल्दा और सिंहावल के बीच, लमनी रेंज के घने जंगल की है। मृत बाघ अपनी मां शेरनी के साथ विचरण करता था, ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर शेरनी की मौजूदगी के बावजूद बाघ की जान कैसे चली गई? क्या वास्तव में यह केवल वर्चस्व की लड़ाई थी, या फिर वन विभाग की घोर लापरवाही का नतीजा?वन विभाग का दावा है कि दो बाघों के बीच वर्चस्व को लेकर संघर्ष हुआ और एक बाघ की मौके पर ही मौत हो गई। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि मौत मौके पर ही हुई थी, तो शव से चार–पांच दिन बाद तक बदबू क्यों आती रही?प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, जब मृत बाघ के शव को जलाया गया, उस समय मौके पर मौजूद सभी अधिकारी और कर्मचारी मास्क लगाए हुए थे। तेज बदबू ने साफ संकेत दे दिया कि बाघ की मौत कई दिन पहले हो चुकी थी। यदि ऐसा है, तो इतने दिनों तक टाइगर रिजर्व की गश्त, कैमरा ट्रैप और निगरानी व्यवस्था आखिर कर क्या रही थी?हैरानी की बात यह भी रही कि पूरे मामले में मीडिया को घटनास्थल से दूर रखा गया। न तस्वीरें सामने आने दी गईं, न स्वतंत्र पुष्टि का मौका। क्या वन विभाग को डर था कि सच्चाई सामने आ गई तो “आपसी संघर्ष” का झूठा पर्दाफाश हो जाएगा?पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने भी मामले को और संदिग्ध बना दिया है। रिपोर्ट के अनुसार मृत बाघ की गर्दन पर दांतों के गहरे निशान, श्वासनली फटी हुई, फेफड़ों में सिकुड़न और पूरे शरीर पर खरोंचों के निशान पाए गए हैं। सवाल यह नहीं कि चोटें कैसे लगीं, सवाल यह है कि ऐसी हालत में बाघ को समय रहते बचाया क्यों नहीं गया?वन विभाग का कहना है कि बाघ के आंतरिक अंगों को जांच के लिए लैब भेजा गया है और रिपोर्ट आने के बाद मौत के कारण स्पष्ट होंगे। लेकिन क्या जांच केवल कागजों में होगी, या फिर जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका भी तय की जाएगी?स्थानीय लोगों और वन्यजीव प्रेमियों के बीच यह चर्चा अब खुलकर हो रही है कि जब से अचानकमार टाइगर रिजर्व में नए डीएफओ ने पदभार संभाला है, तब से लगातार घटनाएं सामने आ रही हैं। क्या यह संयोग है, या फिर जंगल के भीतर सब कुछ “भगवान भरोसे” छोड़ दिया गया है?मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) अरुण पांडेय ने बाघ की मौत की पुष्टि जरूर की है, लेकिन पुष्टि से ज्यादा जरूरी है जवाबदेही। आखिरबाघ की मौत की सूचना सार्वजनिक करने में देरी क्यों हुई?चार दिन तक शव जंगल में पड़ा कैसे रहा?क्या “आपसी संघर्ष” कहकर विभाग अपनी नाकामी छुपा रहा है?अचानकमार की यह घटना सिर्फ एक बाघ की मौत नहीं है, यह वन विभाग की कार्यशैली, निगरानी तंत्र और जवाबदेही पर करारा तमाचा है। अगर अब भी जिम्मेदारी तय नहीं हुई, तो सवाल उठेगा, अगला बाघ किसकी लापरवाही की बलि चढ़ेगा?