तरुण कौशिक/ संपादक सर्वव्यापी/
बिलासपुर जिले के तखतपुर विधानसभा क्षेत्र में भारतीय जनता पार्टी की राजनीतिक रणनीति इन दिनों सवालों के घेरे में है। वर्षों तक पार्टी के लिए संघर्ष करने वाले समर्पित कार्यकर्ताओं को दरकिनार कर दलबदल कर आए नेताओं के सामने भाजपा नेतृत्व का नतमस्तक होना न केवल कार्यकर्ताओं की भावनाओं को आहत कर रहा है, बल्कि संगठन की वैचारिक प्रतिबद्धता पर भी गंभीर प्रश्न खड़े कर रहा है।सूत्रों के अनुसार, हाल ही में अन्य दलों से भाजपा में शामिल हुए कुछ नेताओं को तखतपुर क्षेत्र में संगठनात्मक और राजनीतिक रूप से असामान्य महत्व दिया जा रहा है। टिकट वितरण से लेकर संगठनात्मक पदों और निर्णयों में उनकी दखल बढ़ती जा रही है, जबकि पुराने कार्यकर्ता स्वयं को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। यही कारण है कि क्षेत्र में अंदरखाने असंतोष गहराता जा रहा है।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि तखतपुर विधानसभा क्षेत्र में भाजपा की यह नीति अल्पकालिक लाभ के लिए दीर्घकालिक नुकसान का कारण बन सकती है। जिन नेताओं ने समय-समय पर विचारधारा बदलकर राजनीतिक पाला बदला है, उन पर अत्यधिक भरोसा करना संगठन की जड़ों को कमजोर कर सकता है। पार्टी की पहचान जिस अनुशासन और विचारधारा पर आधारित रही है, वह दलबदलुओं के बढ़ते प्रभाव से धूमिल होती प्रतीत हो रही है।स्थानीय कार्यकर्ताओं का कहना है कि चुनावी जीत के नाम पर यदि पार्टी अपने ही निष्ठावान सिपाहियों की अनदेखी करेगी, तो इसका असर जमीनी स्तर पर साफ दिखाई देगा। बूथ स्तर तक काम करने वाले कार्यकर्ता ही किसी भी दल की असली ताकत होते हैं, और उनकी उपेक्षा अंततः संगठन को ही भारी पड़ती है।अब बड़ा सवाल यह है कि क्या भाजपा नेतृत्व तखतपुर विधानसभा क्षेत्र में बढ़ते असंतोष को गंभीरता से लेगा, या फिर दलबदलुओं के सहारे राजनीतिक संतुलन साधने की नीति जारी रहेगी। आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि पार्टी संगठनात्मक मजबूती को प्राथमिकता देती है ।