तरुण कौशिक/ संपादक/
माघी पूर्णिमा के दिन हमर छत्तीसगढ़ के गँवई रंग-बिरंगा मेला सजथे। ए मेला मं लोग अपन श्रद्धा दिखाथें संग-संग हमर परंपरा, संस्कृति अउ लोक कला के आनंद मं खो जाथें। हाट-बाजार, लोक नाच-गान, गीत-संगीत अउ स्वादिष्ट पराठा–सब्बो चीज ला एके छत के तले देखे अउ अनुभव करे के मौका मिलथे। माघी पूर्णिमा मेला केवल पूजा-पाठ के ठउर नो हे, ये हमर सांस्कृतिक धरोहर ला जियंत रखे के मंच घलो आय।माघ के महीना के पूर्णिमा आवत-आवत छत्तीसगढ़ के धरती मं आस्था के रंग गाढ़ा हो जाथे। शिवरीनारायण, राजिम, चंपारण, सागर, तालागांव, मल्हार, रतनपुर, कोटा, सिरपुर, डोंगरगढ़, मदकूद्वीप जइसने पावन धाम मं हजारों-लाखों श्रद्धालु अपन मनोकामना लेके पहुंचथें। नदी-घाट मं नहावन, पूजा-पाठ, कथा-कीर्तन अउ दान-पुण्य के माहौल मं पूरा इलाका भक्ति के रस मं डूब जाथे।छत्तीसगढ़ के मेला सिरिफ धार्मिक आयोजन नो हवंय, ये ह हमर संस्कृति, परंपरा अउ लोकजीवन के पहचान आय। गांव-गांव ले लोगन आवथें, हाट-बाजार सजथें, लोककला, लोकगीत अउ खान-पान के रौनक बढ़ जाथे। ए मेला मं समाज के हर तबका एक-दूसर के संग जुड़ जाथे, जिहां अमीरी-गरीबी, जात-पांत के भेद मिट जाथे।फेर… आस्था के संग संग कुछ गंभीर सवाल घलो उठथे। भीड़ जादा होय के कारण सुरक्षा, स्वच्छता अउ व्यवस्था के चुनौती बने रहिथे। नदी-घाट मं अव्यवस्था, प्लास्टिक कचरा, असावधानी ले होवत दुर्घटना अउ स्वास्थ्य संकट के खतरा नजर आवथे। कई ठउर मं अस्थायी दुकान, पार्किंग अउ यातायात के सही इंतजाम नइ होय ले श्रद्धालु परेशान हो जाथें।माघी पूर्णिमा मेला मं गंगा-जमुनी संस्कृति के दर्शन तो मिलथे, फेर ए घलो सच आय के नदी-नाला मं फेंके जावत कचरा अउ पूजा सामग्री ले पर्यावरण के भारी नुकसान होथे। आस्था के नाम मं अगर प्रकृति के अपमान होही, त आस्था खुद कमजोर पड़ जाही। धर्म के असली मतलब तो प्रकृति के रक्षा अउ मानवता के सेवा मं छुपे हवय।प्रशासन अउ समाज के साझा जिम्मेदारीमेला के सफल आयोजन मं प्रशासन के भूमिका बहुते जरूरी आय। सुरक्षा बल, स्वास्थ्य सुविधा, स्वच्छता कर्मी अउ यातायात व्यवस्था अगर चुस्त-दुरुस्त होही, त श्रद्धालु निश्चिंत होके पूजा-पाठ कर सकही। संग-संग समाज के हर नागरिक के घलो जिम्मेदारी आय के नियम-कानून के पालन करे, गंदगी नइ फैलाए अउ एक-दूसर के मदद करे।धार्मिक आयोजन के आड़ मं अगर अवैध वसूली, नशाखोरी अउ अराजकता पनपथे, त आयोजन के पवित्रता मं दाग लग जाथे। जरूरत आय के ग्राम समिति, मंदिर ट्रस्ट अउ स्थानीय स्वयंसेवी संगठन मिलके व्यवस्था संभाले अउ गलत तत्व मन ऊपर नजर रखे।आस्था के संग चेतना जरूरीमाघी पूर्णिमा के मेला हमर छत्तीसगढ़ के आत्मा आय, फेर ए तबे तक पवित्र रहि सकथे जब हम सब मिलके जिम्मेदारी ले निभाबो। शुद्ध जल, स्वच्छ घाट, सुरक्षित मेला अउ अनुशासित भीड़–एही सच्ची श्रद्धा आय।आज जरूरत आय के हम अपन धार्मिक परंपरा के संग-संग सामाजिक चेतना घलो मजबूत करन। आस्था अउ व्यवस्था, भक्ति अउ विवेक–दूनों के संतुलन ले माघी पूर्णिमा के मेला सच मं पुण्यदायी बन सकथे।आखिरी मं, माघी पूर्णिमा के मेला-मड़ई हमर सांस्कृतिक धरोहर आय। इसे बचाय रखना, सहेज के रखना अउ आने वाली पीढ़ी बर सुरक्षित बनाय रखना, ए हम सबके साझा जिम्मेदारी आय। आस्था के महापर्व मं हम संकल्प लेवन के धर्म, समाज अउ प्रकृति–तीनों के सम्मान करबो।