उद्योगों से पहले ही त्रस्त जिला, अब जंगलों पर भी प्रहार..सीपत क्षेत्र में हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट की अनुमति पर उठे गंभीर सवाल।

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तरुण कौशिक/ संपादक सर्वव्यापी/

बिलासपुर शहर से मात्र 20 किलोमीटर की वायु दूरी पर स्थित एन.टी.पी.सी. सीपत और वर्धा पावर प्लांट (अलकतरा उद्योग) के कारण पहले ही पूरा जिला हवा, पानी, जंगल और जमीन के गंभीर प्रदूषण की मार झेल रहा है। इन उद्योगों से निकलने वाले जहरीले उत्सर्जन ने पर्यावरणीय संतुलन को बुरी तरह प्रभावित किया है, वहीं अब सीपत के समीप स्थित ग्राम कारीछापर वन परिक्षेत्र में प्रस्तावित हाइड्रो (पानी) पावर प्रोजेक्ट ने पर्यावरण प्रेमियों और स्थानीय ग्रामीणों की चिंता और आक्रोश को और बढ़ा दिया है।प्राप्त जानकारी के अनुसार कारीछापर के पहाड़ी क्षेत्र में 16 बोर तथा जंगल की जमीन पर नीचे की ओर 28 बोर कर टेस्टिंग का कार्य शुरू कर दिया गया है। यह कार्य ऐसे समय में किया जा रहा है, जब पूरा क्षेत्र पहले से ही औद्योगिक प्रदूषण के कारण संकट में है। सवाल यह उठता है कि जब यह क्षेत्र पहले ही अत्यधिक प्रदूषित घोषित होने की कगार पर है, तो फिर जंगल क्षेत्र में नए पावर प्रोजेक्ट की अनुमति आखिर किस आधार पर दी गई?स्थानीय ग्रामीणों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह परियोजना केवल विकास के नाम पर जंगल, जल और जमीन के साथ सीधा अन्याय और अत्याचार है। कारीछापर का वन क्षेत्र जैव विविधता से भरपूर है, जहां वन्य जीवों का प्राकृतिक आवास है और यह क्षेत्र भूजल संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। बोरिंग और परीक्षण कार्य से पहाड़ों की संरचना कमजोर होगी, भूजल स्तर प्रभावित होगा और जंगल का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा।ग्रामीणों का यह भी आरोप है कि परियोजना को लेकर न तो ग्राम सभा की समुचित सहमति ली गई और न ही पर्यावरणीय प्रभावों की जानकारी आम जनता के सामने स्पष्ट रूप से रखी गई। इससे शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।क्षेत्रवासियों का कहना है कि यदि समय रहते इस परियोजना पर रोक नहीं लगाई गई, तो आने वाले समय में सीपत क्षेत्र भीषण पर्यावरणीय संकट का सामना करेगा। हवा, पानी और जमीन पूरी तरह से दूषित हो जाएगी, जिसका सीधा असर आम जनता के स्वास्थ्य, कृषि और भविष्य पर पड़ेगा।अंत में क्षेत्र के जागरूक नागरिकों, ग्रामीणों और पर्यावरण प्रेमियों ने समाचार पत्रों और मीडिया के माध्यम से विनम्र अपील की है कि इस गंभीर मुद्दे को प्रमुखता से प्रकाशित कर जनहित में आवाज़ उठाई जाए, ताकि जंगल, जल और जमीन को बचाया जा सके और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की रक्षा हो सके।


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