संवाददाता/ सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ में वन विभाग को आमतौर पर “हरा हंडा” कहा जाता है, लेकिन जब इसी हरे हंडे की रखवाली करने वाले हाथों पर सवाल उठने लगें, तो मामला केवल भ्रष्टाचार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी प्रशासनिक व्यवस्था की जवाबदेही पर प्रश्नचिह्न लग जाता है। जिला बिलासपुर से सामने आया ऐसा ही एक मामला अब वन विभाग के लिए गले की फांस बनता जा रहा है।सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत प्राप्त दस्तावेज़ों के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2024–25 में पर्यावरण वानिकी योजना के अंतर्गत ईको-पर्यटन विकास कार्यों के लिए कुल 1 करोड़ 46 लाख रुपये की राशि स्वीकृत की गई थी। इस बजट में भवन मरम्मत हेतु सामग्री क्रय, थिएटर निर्माण, डिजिटल साइनेज, पर्यटकों के लिए वाटर कूलर, ग्लो साइन बोर्ड, इंटरएक्टिव टच स्क्रीन, शैक्षिक प्रदर्शन सेटअप और एलसीडी डिस्प्ले जैसे कार्य शामिल थे।
दस्तावेज़ यह भी दर्शाते हैं कि इन सभी कार्यों के लिए विभागीय स्तर पर प्रशासकीय एवं तकनीकी स्वीकृति दी गई थी। तकनीकी स्वीकृति में स्पष्ट निर्देश थे कि कार्य निर्धारित मापदंडों और गुणवत्ता मानकों के अनुरूप कराए जाएंगे। इसके बावजूद आरोप है कि या तो ये कार्य धरातल पर हुए ही नहीं, या फिर घटिया गुणवत्ता के साथ औपचारिकता निभा दी गई।मामले की गंभीरता को देखते हुए विभाग के प्रधान मुख्य वन संरक्षक (विकास/योजना) के समक्ष लिखित शिकायत प्रस्तुत की गई थी। शिकायत पर संज्ञान लेते हुए नवंबर 2025 में जांच के आदेश जारी किए गए और 14 दिवस के भीतर रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए। हैरानी की बात यह है कि आदेश जारी होने के 85 दिन बीत जाने के बाद भी जांच पूरी नहीं हो सकी है।
सूत्रों के मुताबिक, जांच अधिकारी ने प्रारंभ में शिकायतकर्ता को निष्पक्ष और पारदर्शी जांच का भरोसा दिलाया था। शिकायत के साथ संलग्न आरटीआई दस्तावेज़ भी उन्हें सौंपे गए। लेकिन बाद में जांच अधिकारी के रुख में अचानक बदलाव देखा गया। आरोप है कि उन्होंने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि उन्हें शिकायत से संबंधित कोई पत्र प्राप्त ही नहीं हुआ, बल्कि किसी अन्य व्यक्ति द्वारा शिकायत की गई है।इसी दौरान यह भी चर्चा सामने आई कि शिकायत से जुड़े महत्वपूर्ण दस्तावेज़ कथित तौर पर ‘पिछले दरवाज़े’ से एक प्रभावशाली व्यक्ति को सौंप दिए गए। इसके बाद नए सिरे से दूसरी शिकायत खड़ी कर पूरे मामले को मैनेज करने और आपसी सौदेबाज़ी का खेल शुरू होने की चर्चाएं तेज हो गईं। इन घटनाक्रमों ने जांच की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।बताया जा रहा है कि वर्ष 2024–25 में प्राप्त बजट से जुड़े इस कथित भ्रष्टाचार के मामले को लेकर फरवरी 2026 के विधानसभा सत्र में सवाल उठाने की तैयारी चल रही है। यदि मामला सदन में पहुंचता है, तो न केवल वन विभाग की कार्यप्रणाली बल्कि उसकी जांच प्रणाली भी कठघरे में खड़ी हो सकती है।
अब सवाल यह है कि क्या यह जांच वास्तव में निष्पक्ष रूप से अपने निष्कर्ष तक पहुंचेगी, या फिर यह मामला भी समय के साथ फाइलों के ढेर में दबा दिया जाएगा—जिसका जवाब फिलहाल इंतज़ार में है।