तरुण कौशिक/संपादक, सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ शासन के मंत्रालय से लेकर जिलों तक विभिन्न विभागों में प्लेसमेंट के माध्यम से भर्ती किए गए कर्मचारियों का शोषण अब किसी एक कार्यालय या जिले तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह एक संगठित व्यवस्था का रूप ले चुका है। सरकार द्वारा एक कर्मचारी के लिए ठेकेदारों को प्रति माह 15 हजार रुपये से अधिक की राशि का भुगतान किया जा रहा है, लेकिन वही कर्मचारी जब वेतन पाता है तो उसे मात्र 8 से 10 हजार रुपये मासिक देकर चुप करा दिया जाता है। सरकार के पैसे से ठेकेदार मालामाल हो रहे हैं और कर्मचारी न्यूनतम जरूरतों के लिए संघर्ष करने को मजबूर हैं।मंत्रालयों में पदस्थ प्लेसमेंट कर्मचारी वर्षों से नियमित कर्मचारियों की तरह कार्य कर रहे हैं। फाइलों का संधारण, डाटा एंट्री, भृत्य, विभिन्न योजनाओं की मॉनिटरिंग, कार्यालयीन पत्राचार और विभागीय जिम्मेदारियों का पूरा बोझ इन्हीं कर्मियों पर डाला जा रहा है, लेकिन अधिकार और सम्मान के मामले में उन्हें आज भी अस्थायी और असुरक्षित समझा जा रहा है। सरकार और विभागों की कार्यप्रणाली इन्हीं कर्मचारियों के भरोसे चल रही है, इसके बावजूद उनके वेतन और भविष्य को लेकर कोई स्पष्ट नीति नजर नहीं आती।जिलों में स्थिति और भी चिंताजनक है। कलेक्टोरेट, जिला कार्यालयों, जनपद पंचायतों और नगरीय निकायों में कार्यरत प्लेसमेंट कर्मचारियों को कई बार समय पर वेतन तक नहीं मिल पाता। कहीं दो-दो महीने की देरी से भुगतान होता है तो कहीं ईपीएफ और ईएसआई की कटौती तो होती है, लेकिन उसका लाभ कर्मचारियों तक नहीं पहुंचता। कई मामलों में कर्मचारियों को न्यूनतम मजदूरी से भी कम वेतन देकर पूरा समय काम कराया जा रहा है और विरोध करने पर नौकरी से हटाने की धमकी दी जाती है।इन कर्मचारियों की सबसे बड़ी पीड़ा यह है कि वर्षों तक एक ही विभाग में काम करने के बावजूद उन्हें न तो स्थायित्व मिलता है और न ही भविष्य की कोई सुरक्षा। हर साल नया अनुबंध, हर समय नौकरी जाने का डर और ठेकेदार की मर्जी पर टिका पूरा जीवन, यही प्लेसमेंट कर्मचारियों की हकीकत बन चुकी है। एक दिन की अनुपस्थिति या सवाल उठाने भर से काम से निकाल दिए जाने की घटनाएं भी सामने आती रही हैं।सबसे गंभीर पहलू यह है कि इस पूरे शोषण तंत्र की जानकारी शासन और प्रशासन दोनों स्तरों पर होने के बावजूद अब तक कोई ठोस और प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई है। प्लेसमेंट कर्मचारियों और उनके संगठनों द्वारा कई बार ज्ञापन सौंपे गए, शिकायतें दर्ज कराई गईं, लेकिन अधिकांश मामले फाइलों में दबकर रह गए। ठेकेदारों की मनमानी पर न तो जांच होती है और न ही भुगतान व्यवस्था में पारदर्शिता लाई जा रही है।अब यह सवाल लगातार उठने लगा है कि जब सरकार पूरी राशि का भुगतान कर रही है, तो कर्मचारी को उसका पूरा हक क्यों नहीं मिल रहा। ठेकेदारों के मुनाफे पर लगाम कब लगेगी और क्या प्लेसमेंट कर्मचारियों को कभी न्याय मिल पाएगा या फिर यह शोषण मंत्रालय से जिलों तक यूं ही चलता रहेगा।इस गंभीर मुद्दे पर अब केवल आश्वासन नहीं बल्कि ठोस निर्णय की आवश्यकता है। यदि विष्णु देव साय सरकार ने समय रहते ठेकेदार प्रथा पर नियंत्रण, डायरेक्ट पेमेंट सिस्टम, न्यूनतम वेतन की गारंटी और लंबे समय से कार्यरत कर्मचारियों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए कदम नहीं उठाए, तो यह मामला आने वाले समय में बड़ा प्रशासनिक ही नहीं बल्कि सामाजिक और राजनीतिक मुद्दा बन सकता है।