तरुण कौशिक/ संपादक, सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ के आदिवासी मुख्यमंत्री विष्णु देव साय राज्य की पहचान बनी लोक संस्कृति, परंपरागत खेलकूद और आदिवासी विरासत को पुनर्जीवित करने की दिशा में लगातार ठोस और सराहनीय पहल कर रहे हैं। विशेष रूप से अंबिकापुर-सरगुजा और बस्तर संभाग जैसे बाहुल्य आदिवासी क्षेत्रों में उनकी नीतियाँ अब ज़मीन पर असर दिखाने लगी हैं।मुख्यमंत्री बनने के बाद विष्णु देव साय ने स्पष्ट किया था कि विकास केवल सड़क-भवन तक सीमित नहीं होगा, बल्कि संस्कृति, खेल और परंपराओं का संरक्षण भी सरकार की प्राथमिकता होगी। इसी सोच के तहत सरगुजा और बस्तर क्षेत्र की लोकनृत्य, लोकगीत, पारंपरिक वाद्ययंत्र, आदिवासी खेलों को राज्यस्तरीय पहचान दिलाने की दिशा में योजनाबद्ध कार्य हो रहे हैं।सरकार द्वारा लोक कलाकारों के सम्मान, प्रशिक्षण और मंच उपलब्ध कराने के लिए विशेष कार्यक्रम शुरू किए गए हैं। वहीं परंपरागत खेलकूद जैसे गिल्ली-डंडा, खो-खो, कबड्डी के स्थानीय स्वरूप, तीरंदाजी, मलखंभ और आदिवासी खेल प्रतियोगिताओं को प्रोत्साहन दिया जा रहा है, जिससे ग्रामीण और वनांचल के युवाओं में नया उत्साह देखने को मिल रहा है।अंबिकापुर और सरगुजा संभाग में संस्कृति महोत्सव, खेल उत्सव और जनजातीय कार्यक्रमों का आयोजन बढ़ा है, वहीं बस्तर संभाग में मां दंतेश्वरी की धरती से जुड़े बस्तर दशहरा, मड़ई मेला और आदिवासी खेल महोत्सव को सरकार का विशेष संरक्षण मिल रहा है। इससे न केवल सांस्कृतिक विरासत मजबूत हुई है, बल्कि पर्यटन और स्थानीय रोजगार को भी बढ़ावा मिला है।राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आदिवासी मुख्यमंत्री के रूप में विष्णु देव साय की यह पहल छत्तीसगढ़ की आत्मा से जुड़ा काम है। इससे आदिवासी समाज को सम्मान मिला है और युवाओं को अपनी जड़ों से जुड़ने का अवसर भी।कुल मिलाकर, सरगुजा से बस्तर तक लोक संस्कृति और खेलकूद को बढ़ावा देने की मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की पहल न सिर्फ सराहनीय है, बल्कि आने वाले समय में छत्तीसगढ़ को संस्कृति और खेल के राष्ट्रीय मानचित्र पर नई पहचान दिलाने वाली साबित हो सकती है।