तरुण कौशिक/ संपादक ,सर्वव्यापी/
बिलासपुर संभाग अंतर्गत गौरेला–पेंड्रा–मरवाही जिले में इमारती लकड़ी की कथित तस्करी का मामला अब केवल वन अपराध तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह पूरे वन तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। विश्वस्त सूत्रों के अनुसार, मरवाही परिक्षेत्र में पदस्थ परिक्षेत्र सहायक शिवशंकर तिवारी पर इमारती लकड़ी तस्करी में संलिप्तता के गंभीर आरोप हैं, लेकिन उन्हें बचाने के लिए विभागीय अधिकारी ही सामने आते दिखाई दे रहे हैं।विभागीय सूत्र बताते हैं कि मामला सामने आने और सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद कई समाचार पत्रों में जानबूझकर शिवशंकर तिवारी का नाम सामने नहीं आने दिया गया, जबकि इस पूरे षड्यंत्र का मुख्य सूत्रधार उन्हीं को बताया जा रहा है। सोशल मीडिया पर वायरल दस्तावेजों में रेंजर के कथित सशक्त ड्राइवर के बैंक खाते में हुए लेन–देन को अहम सबूत माना जा रहा है। जानकारों का कहना है कि जब प्रत्यक्ष वित्तीय लेन–देन सामने है, तो इससे बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता है।इस पूरे प्रकरण में डीएफओ मरवाही की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। जिस प्रकार की चुप्पी और कोताही इस मामले में बरती गई है, उसने विभागीय कार्यप्रणाली को कठघरे में खड़ा कर दिया है। बताया जा रहा है कि जब्त की गई लकड़ी साल प्रजाति की है, जो राष्ट्रीयकृत प्रजाति के अंतर्गत आती है। ऐसे में न केवल वन अधिनियम के तहत सख्त कार्रवाई बनती थी, बल्कि राजस्व और वन क्षेत्र दोनों में विधिसम्मत कार्यवाही अनिवार्य थी।विभागीय सूत्रों के अनुसार, तस्करी में लिप्त वन कर्मियों द्वारा मोटी रकम लेकर वाहन को छोड़ दिया गया और इमारती लकड़ी को बेच दिया गया। इस पूरे घटनाक्रम ने विभागीय संरक्षण की आशंका को और मजबूत किया है। हैरानी की बात यह है कि डीएफओ मरवाही द्वारा यह कहकर मामले को कमजोर करने का प्रयास किया गया कि यह प्रकरण वर्ष 2025 का है, जबकि शिकायत, दस्तावेज और सोशल मीडिया पर उपलब्ध तथ्य साफ तौर पर संकेत दे रहे हैं कि 23 जनवरी को इस कथित षड्यंत्र को अंजाम दिया गया।इस मामले को लेकर आमजन प्रतिनिधियों में भारी आक्रोश है। कई जनप्रतिनिधियों ने ऐसे डीएफओ को तत्काल सेवा से मुक्त करने की मांग की है। वहीं, बिलासपुर के मुख्य वन संरक्षक (PCCF) स्तर से भी अब तक उप वन क्षेत्रपाल शिवशंकर तिवारी के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं होने से यह स्पष्ट संकेत मिल रहा है कि उन्हें उच्च अधिकारियों का संरक्षण प्राप्त है।अब बड़ा सवाल यह है कि जब सबूत सामने हैं, मामला सार्वजनिक हो चुका है और जनता जवाब मांग रही है, तो आखिर वन विभाग की चुप्पी किसे बचाने के लिए है?क्या यह मामला भी फाइलों में दबा दिया जाएगा, या फिर दोषियों पर निष्पक्ष और कठोर कार्रवाई होगी, इस पर पूरे प्रदेश की निगाहें टिकी हैं।