तरुण कौशिक/ संपादक, सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता पार्टी की वर्तमान स्थिति बेहद चिंताजनक दौर से गुजर रही है। संगठन के भीतर असंतोष खुलकर सामने आने लगा है और पार्टी की जमीनी पकड़ लगातार कमजोर होती जा रही है। हालात ऐसे हैं कि चाहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी प्रदेश में हजारों सभाएँ कर लें, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में भाजपा के लिए चुनावी जीत की राह आसान नहीं दिख रही।पार्टी के वरिष्ठ और समर्पित नेताओं की लगातार उपेक्षा से कार्यकर्ताओं में गहरी नाराजगी है। वर्षों से संगठन के लिए संघर्ष करने वाले, बूथ स्तर पर पार्टी को मजबूत करने वाले कार्यकर्ता आज खुद को हाशिये पर महसूस कर रहे हैं। इसके विपरीत, नेतृत्व की चापलूसी करने वाले और सत्ता के करीब रहने वाले चेहरों को महत्वपूर्ण पद और जिम्मेदारियाँ सौंप दी गई हैं, जिससे संगठन के भीतर असंतुलन और अविश्वास की स्थिति बन गई है।भाजपा के पुराने और निष्ठावान नेताओं का कहना है कि अब पार्टी में अनुभव, संघर्ष और जनसंपर्क से ज्यादा महत्व व्यक्तिगत समीकरणों और खुशामद को दिया जा रहा है। यही वजह है कि जमीनी स्तर पर काम करने वाले भाजपाई कार्यकर्ता न तो निर्णय प्रक्रिया में शामिल हैं और न ही उनकी बातों को गंभीरता से सुना जा रहा है।स्थिति को और गंभीर बनाता है गैर-प्रदेशियों का बढ़ता प्रभाव। स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं के बजाय बाहर से आए चेहरों को मान-सम्मान और अहम जिम्मेदारियाँ मिलने से छत्तीसगढ़ी कार्यकर्ताओं में असंतोष और गहरा गया है। इससे न केवल संगठन की स्थानीय पहचान कमजोर हो रही है, बल्कि जनता के बीच भी यह संदेश जा रहा है कि भाजपा अब स्थानीय भावनाओं से कटती जा रही है।राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो यदि भाजपा ने समय रहते संगठनात्मक सुधार नहीं किए, वरिष्ठ नेताओं को सम्मान नहीं दिया और जमीनी कार्यकर्ताओं को फिर से केंद्र में नहीं लाया, तो आगामी चुनावों में पार्टी को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। फिलहाल छत्तीसगढ़ में भाजपा की स्थिति सिर्फ सभाओं और नारों से नहीं, बल्कि ठोस संगठनात्मक बदलाव से ही सुधर सकती है।