तरुण कौशिक/संपादक ,सर्वव्यापी
देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी कही जाने वाली भारतीय जनता पार्टी की असली ताकत उसके करोड़ों समर्पित कार्यकर्ता हैं। यह बात पार्टी के भीतर और बाहर लगातार गूंज रही है कि भाजपा किसी एक चेहरे के दम पर नहीं, बल्कि बूथ स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक सक्रिय कार्यकर्ताओं के संघर्ष, समर्पण और संगठनात्मक मेहनत के कारण खड़ी है।पार्टी के शुरुआती दौर से ही भाजपा ने “कार्यकर्ता आधारित संगठन” की पहचान बनाई है। गांव-गांव, गली-गली में पार्टी का झंडा उठाने वाला सामान्य कार्यकर्ता ही भाजपा की असली रीढ़ रहा है। चुनावी जीत हो या कठिन राजनीतिक दौर, हर स्थिति में कार्यकर्ताओं ने बिना किसी निजी स्वार्थ के पार्टी को संभाले रखा।हाल के वर्षों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का व्यक्तित्व और लोकप्रियता निश्चित रूप से भाजपा के लिए बड़ा आकर्षण रहा है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि केवल चेहरे की राजनीति के भरोसे कोई भी पार्टी लंबे समय तक टिक नहीं सकती। भाजपा की निरंतर चुनावी सफलता के पीछे बूथ प्रबंधन, घर-घर संपर्क, सोशल मीडिया से लेकर जमीनी आंदोलन तक, कार्यकर्ताओं की अथक मेहनत निर्णायक भूमिका निभाती रही है।पार्टी के भीतर ही कई वरिष्ठ नेताओं और पुराने कार्यकर्ताओं में यह भावना उभर रही है कि संगठन में चापलूसी और अवसरवाद को बढ़ावा मिलने से मूल कार्यकर्ता खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। उनका कहना है कि अगर समय रहते संगठन ने अपने समर्पित कार्यकर्ताओं की आवाज नहीं सुनी, तो इसका असर भविष्य की चुनावी तैयारियों पर पड़ सकता है।भाजपा का इतिहास गवाह है कि जब-जब कार्यकर्ताओं को सम्मान, जिम्मेदारी और विश्वास मिला है, तब-तब पार्टी ने नई ऊंचाइयों को छुआ है। आज भी पार्टी की असली पूंजी कोई एक नेता नहीं, बल्कि वह लाखों कार्यकर्ता हैं जो बिना कैमरे की चमक के, बिना पद-प्रतिष्ठा की चाह के, पार्टी को अपने कंधों पर उठाए हुए हैं।वहीं सबको पता है कि भारतीय जनता पार्टी किसी एक व्यक्ति की देन नहीं है और न ही उसका अस्तित्व किसी एक चेहरे पर टिका है। इसके बावजूद पिछले कुछ वर्षों में भाजपा की पहचान को जिस तरह नरेंद्र मोदी के नाम से जोड़कर प्रस्तुत किया जा रहा है, वह न केवल राजनीतिक रूप से खतरनाक है बल्कि स्वयं भाजपा की वैचारिक आत्मा के खिलाफ भी है। आज भाजपा का नाम आते ही पार्टी कम और व्यक्ति ज्यादा दिखाई देने लगा है, मानो भाजपा मोदी के दम पर चल रही हो, जबकि सच्चाई इसके ठीक उलट है।नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री हैं, पार्टी के सबसे प्रभावशाली नेता हैं, इसमें कोई संदेह नहीं। लेकिन यह मान लेना या मनवाने की कोशिश करना कि भाजपा सिर्फ मोदी की वजह से है, उन लाखों कार्यकर्ताओं का अपमान है जिन्होंने दशकों तक जमीन पर संघर्ष किया, लाठियां खाईं, जेल गए, सत्ता से दूर रहकर भी संगठन को जीवित रखा। भाजपा का निर्माण भाषणों से नहीं, बल्कि बूथ स्तर पर पसीना बहाने वाले कार्यकर्ताओं से हुआ है।आज मोदी के अंधभक्त यह स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं कि भाजपा का “परिवार” मोदी का निजी परिवार नहीं, बल्कि एक वैचारिक संगठन है। भाजपा का परिवार आरएसएस की शाखाओं से निकलकर गांव-गांव, गली-गली में तैयार हुआ है। अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे नेताओं ने भी कभी यह दावा नहीं किया कि पार्टी उनके बिना नहीं चल सकती। वे जानते थे कि नेता आते-जाते रहते हैं, लेकिन संगठन स्थायी होता है।भाजपा के पंचतत्व—राष्ट्र प्रथम, संगठन सर्वोपरि, अनुशासन, त्याग और विचार आज मोदी भक्ति के शोर में दबते जा रहे हैं। सोशल मीडिया पर पार्टी नहीं, मोदी दिखाई देते हैं। आलोचना भाजपा की नहीं, सीधे मोदी की होती है और समर्थन भी तर्क से नहीं, अंधभक्ति से किया जाता है। यह प्रवृत्ति भाजपा को कैडर आधारित पार्टी से व्यक्तिवादी पार्टी की ओर धकेल रही है, जो उसके इतिहास और भविष्य—दोनों के लिए घातक है।चुनाव सिर्फ चेहरे से नहीं जीते जाते। हर जीत के पीछे हजारों कार्यकर्ताओं की मेहनत होती है जो न पोस्टर में दिखते हैं, न मंच पर जगह पाते हैं। अगर आज भाजपा देश की सबसे बड़ी पार्टी है, तो यह नरेंद्र मोदी के करिश्मे से पहले संगठन की मजबूती का परिणाम है। मोदी प्रधानमंत्री बने क्योंकि पार्टी मजबूत थी, पार्टी मोदी की वजह से मजबूत नहीं हुई।नरेंद्र मोदी को यह समझना होगा कि सत्ता में रहते हुए भी संगठन को केंद्र से बाहर करना, हर उपलब्धि को स्वयं के नाम से जोड़ना और हर असहमति को व्यक्तिगत विरोध मानना, भाजपा की संस्कृति नहीं है। भाजपा कभी “एक नेता, एक आवाज” वाली पार्टी नहीं रही। यही फर्क था भाजपा और कांग्रेस की कार्यशैली में, जिसे आज धीरे-धीरे मिटाया जा रहा है।सम्मान और समर्थन में अंतर होता है। मोदी का सम्मान होना चाहिए, लेकिन भाजपा को मोदी में समेट देना खतरनाक भूल है। यदि भाजपा कार्यकर्ता खुद को हाशिये पर महसूस करने लगे, तो संगठन कमजोर होगा और जब संगठन कमजोर होता है, तब सबसे ताकतवर नेता भी अकेला पड़ जाता है।भाजपा नरेंद्र मोदी से बड़ी है और रहेगी, यदि समय रहते यह सच्चाई स्वीकार कर ली जाए। क्योंकि भाजपा किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि करोड़ों कार्यकर्ताओं के त्याग, संघर्ष और विचार की पार्टी है।राजनीतिक संदेश साफ है कि भाजपा की मजबूती व्यक्तित्व नहीं, संगठन है; चेहरा नहीं, कार्यकर्ता है; और अगर यह संतुलन बिगड़ा, तो सवाल सिर्फ नेतृत्व का नहीं, बल्कि पार्टी के भविष्य का भी होगा।