तरुण कौशिक/संपादक, सर्वव्यापी
बिलासपुर संभाग अंतर्गत गौरेला–पेंड्रा–मरवाही जिले का मरवाही वन मंडल इन दिनों गंभीर आरोपों को लेकर सुर्खियों में है। वर्षों से चली आ रही अनियमितताओं और भ्रष्टाचार की परतें अब एक-एक कर सामने आ रही हैं। आरोप है कि मरवाही वन मंडल को कुछ चुनिंदा लोगों ने अपने निजी हितों के लिए “चारागाह” बना लिया है, जहां नियम, कानून और विभागीय मर्यादाएं पूरी तरह गौण हो चुकी हैं।विभागीय सूत्रों के अनुसार वन कार्यों, मुआवजा प्रकरणों, लकड़ी परिवहन, राष्ट्रीय वनरोपण कार्यक्रम (एनएपी), ग्रीन इंडिया मिशन (जीआईएम) और वन अग्नि संरक्षण एवं प्रबंधन योजना (एफएफपीएम), कैंपा सहित अन्य योजनाओं और ठेके और प्रशासनिक स्वीकृतियों में लगातार गड़बड़ियां हो रही हैं। हैरानी की बात यह है कि जिन अधिकारियों पर इन अनियमितताओं पर रोक लगाने की जिम्मेदारी थी, वही या तो मौन साधे रहे या फिर कथित रूप से इन पर पर्दा डालते नजर आए। इसी कड़ी में वर्तमान वनमंडलाधिकारी ग्रीष्मी चांद की भूमिका को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं।स्थानीय स्तर पर यह चर्चा आम है कि पहली बार ऐसा प्रतीत हो रहा है जब भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों में वनमंडलाधिकारी की “कलम” भी संदेह के घेरे में आई है। आरोप है कि कुछ निर्णय और फाइलों पर किए गए हस्ताक्षर बाद में विवाद का कारण बन रहे हैं। जानकारों का कहना है कि यदि समय रहते सावधानी नहीं बरती गई और पारदर्शिता नहीं लाई गई, तो मामला उच्चस्तरीय जांच तक जा सकता है।वन विभाग से जुड़े कर्मचारियों और क्षेत्र के जानकार नागरिकों का मानना है कि मरवाही वन मंडल में लंबे समय से एक संगठित तंत्र काम कर रहा है, जिसमें कुछ प्रभावशाली लोग शामिल हैं। यही वजह है कि शिकायतों के बावजूद अब तक ठोस कार्रवाई नहीं हो पाई है। इससे न केवल शासन की छवि धूमिल हो रही है, बल्कि ईमानदार अधिकारियों और कर्मचारियों का मनोबल भी टूट रहा है।इस पूरे प्रकरण को लेकर कर्मचारियों ने निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच की मांग तेज कर दी है। उनका कहना है कि यदि आरोप निराधार हैं तो जांच से स्थिति साफ हो जाएगी, और यदि आरोप सही हैं तो दोषियों पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। फिलहाल मरवाही वन मंडल का यह मामला पूरे संभाग में चर्चा का विषय बना हुआ है और सभी की निगाहें आने वाले प्रशासनिक कदमों पर टिकी हैं।