गौरेला -पेंड्रा-मरवाही/नूर मोहम्मद, ब्यूरो चीफ सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ में वन विभाग की कार्यप्रणाली एक बार फिर कठघरे में है। खुद को “ईमानदार अफसर” बताने वाले श्रीनिवासन राव (प्रधान मुख्य वन संरक्षक) पर यह गंभीर सवाल उठ रहे हैं कि आखिर मरवाही वनमंडल में सामने आए भ्रष्टाचार के मामलों में वे अब तक निर्णायक कार्रवाई से क्यों बचते नजर आ रहे हैं?मरवाही वनमंडल में वर्षों से चल रही कथित अनियमितताओं—फर्जी भुगतान, कार्यों में गुणवत्ता से समझौता, और नियमों की खुलेआम अनदेखी—की शिकायतें बार-बार शासन तक पहुँचीं। जांच के संकेत मिले, दस्तावेज सामने आए, और अफसरों-कर्मचारियों की भूमिका भी संदिग्ध पाई गई। इसके बावजूद, जिम्मेदारों पर कार्रवाई ठहरी क्यों?कमीशन की राह ऊपर तक?विपक्षी हलकों और सामाजिक संगठनों में यह चर्चा तेज है कि क्या मरवाही के भ्रष्टाचार की “कमीशन-चेन” ऊपर तक सुरक्षित पहुँच पा रही है? सवाल सीधे-सीधे वन मंत्री केदार कश्यप तक जा रहे हैं। अगर सब साफ है, तो दोषियों पर कठोर कार्रवाई क्यों नहीं? और अगर नहीं, तो किसके संरक्षण में फाइलें ठंडी पड़ रही हैं?मुख्य सचिव के आदेश भी बेअसर?मामले को और गंभीर बनाता है यह तथ्य कि मुख्य सचिव विकास शील के स्तर से निर्देश दिए जाने के बावजूद जमीनी कार्रवाई नदारद रही। क्या विभागीय मुखिया आदेशों को हल्के में ले रहे हैं, या सिस्टम के भीतर कोई अदृश्य दीवार खड़ी है?मुख्यमंत्री सचिवालय क्यों बेबस?राज्य के सर्वोच्च प्रशासनिक केंद्र—मुख्यमंत्री सचिवालय—की चुप्पी भी सवालों के घेरे में है। यदि शिकायतें, साक्ष्य और निर्देश मौजूद हैं, तो कार्रवाई रुकने का कारण क्या है? क्या सत्ता और अफसरशाही के बीच जवाबदेही की कड़ी कमजोर पड़ चुकी है?जनता के सवाल, जवाब किससे?मरवाही के वन, संसाधन और सार्वजनिक धन—सब दांव पर हैं। जनता जानना चाहती है किदोषियों पर कब होगी ठोस कार्रवाई?संरक्षण देने वालों की भूमिका की जांच कब?क्या “ईमानदारी” के दावे अब सिर्फ बयानबाजी रह गए हैं?जब तक इन सवालों के स्पष्ट और पारदर्शी जवाब नहीं मिलते, तब तक मरवाही वनमंडल का यह मामला केवल एक विभागीय विवाद नहीं, बल्कि शासन की नीयत और प्रशासनिक इच्छाशक्ति की बड़ी परीक्षा बना रहेगा।