गौरेला-पेंड्रा-मरवाही/ नूर मोहम्मद, ब्यूरो चीफ सर्वव्यापी
जिले के मरवाही वनमंडल में पदस्थ 2020 बैच की आईएफएस अधिकारी ग्रीष्मी चांद अपने कार्यों और प्रशासनिक निर्णयों को लेकर भले ही सराहना बटोर रही हों, लेकिन उनके व्यवहार को लेकर अब एक गंभीर सवाल खड़ा हो गया है। आरोप है कि वह वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ताओं और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के फोन कॉल और संदेशों का जवाब देना उचित नहीं समझतीं।स्थानीय जनप्रतिनिधियों और सामाजिक हलकों में चर्चा है कि प्रशासनिक शिष्टाचार और संवाद की परंपरा का पालन जहां प्रदेश के शीर्ष अधिकारी करते हैं, वहीं मरवाही वनमंडल अधिकारी का यह रवैया समझ से परे है। जनप्रतिनिधियों का कहना है कि मुख्यमंत्री सचिवालय से लेकर जिला प्रशासन तक, अधिकारी संवाद के लिए सुलभ रहते हैं, लेकिन मरवाही वनमंडल स्तर पर संवाद की दीवार खड़ी कर दी गई है।जनप्रतिनिधियों ने उदाहरण देते हुए कहा कि मुख्य सचिव विकास शील जैसे शीर्ष अधिकारी न केवल फोन उठाते हैं बल्कि संदेशों का भी समय पर जवाब देते हैं। इसी तरह जिले की कलेक्टर लीना कमलेश मंडावी भी जनसमस्याओं पर संवाद के लिए उपलब्ध रहती हैं। यहां तक कि वन विभाग के मुखिया श्रीनिवासन राव भी संपर्क से परहेज़ नहीं करते।ऐसे में सवाल उठता है कि क्या मरवाही वनमंडल अधिकारी खुद को संवाद और जवाबदेही से परे मान रही हैं? क्या एक फील्ड पोस्टिंग पर तैनात अधिकारी का यह दायित्व नहीं बनता कि वह मीडिया, जनप्रतिनिधियों और समाज के सवालों का जवाब दे?वहीं वरिष्ठ नागरिकों का कहना है कि सूचना का अधिकार और लोकतांत्रिक व्यवस्था केवल कागजों तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यवहार में भी दिखना चाहिए। फोन न उठाना और संदेशों की अनदेखी करना प्रशासन और जनता के बीच अविश्वास की खाई को और गहरा करता है।यह मामला केवल एक अधिकारी के व्यवहार तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रशासनिक संस्कृति पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है। जब शीर्ष स्तर पर संवाद की मिसाल कायम है, तो फिर मैदानी स्तर पर यह ‘मौन प्रशासन’ क्यों? अब देखना यह है कि जिला प्रशासन और वन विभाग इस गंभीर मुद्दे पर क्या संज्ञान लेते हैं, या यह सवाल भी अनसुना ही रह जाएगा।