तरुण कौशिक, संपादक, सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ के प्रथम मुख्यमंत्री स्वर्गीय अजीत जोगी के गृह जिले गौरेला–पेंड्रा–मरवाही में सरकारी दफ्तरों में व्याप्त भ्रष्टाचार अब प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि एक सुनियोजित तंत्र का रूप ले चुका है। केंद्र एवं राज्य सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं में खुलेआम गड़बड़ी कर करोड़ों रुपये के घोटालों के आरोप सामने हैं, लेकिन जिम्मेदार अफसरों और जनप्रतिनिधियों पर अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी है।लोक निर्माण विभाग (PWD), प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, जल संसाधन विभाग, खनिज विभाग, वन विभाग, पंचायत एवं खाद्य विभाग—लगभग हर विभाग पर अनियमितता और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं। सड़क निर्माण में घटिया गुणवत्ता, जल संसाधन कार्यों में फर्जी माप-जोख, खनिज विभाग में अवैध उत्खनन को संरक्षण, वन विभाग में नियमों की अनदेखी और पंचायतों में कागज़ी विकास के सहारे भुगतान—ये सब अब आम शिकायतें बन चुकी हैं।विशेष रूप से डीएमएफ (डिस्ट्रिक्ट मिनरल फाउंडेशन) फंड को लेकर उठे सवाल सबसे अधिक चौंकाने वाले हैं। खनन प्रभावित क्षेत्रों के विकास के लिए बने इस फंड में भी कथित तौर पर भारी गड़बड़ी और अपारदर्शी खर्च के आरोप हैं, जिससे वास्तविक लाभार्थी आज भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं।सबसे गंभीर तथ्य यह है कि इन सभी मामलों की शिकायतें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मुख्यमंत्री विष्णु देव साय, संबंधित विभागीय मंत्रियों और सचिवों तक भेजी जा चुकी हैं। इसके बावजूद ज़मीनी स्तर पर न जांच तेज़ हुई और न ही दोषियों पर कोई निर्णायक कार्रवाई दिखाई दे रही है।स्थानीय लोगों का आरोप है कि यह चुप्पी सामान्य नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार की आपसी मिलीभगत का संकेत है। सवाल यह है कि जब शिकायतें शीर्ष तक पहुँच चुकी हैं, तो कार्रवाई क्यों थमी हुई है? क्या प्रशासनिक संरक्षण के चलते घोटालेबाज़ बेखौफ हैं?अब यह मुद्दा सिर्फ़ एक जिले का नहीं रहा। यह शासन की पारदर्शिता, जवाबदेही और राजनीतिक इच्छाशक्ति की सीधी परीक्षा बन चुका है। यदि समय रहते निष्पक्ष जांच और कठोर कार्रवाई नहीं हुई, तो गौरेला–पेंड्रा–मरवाही भ्रष्टाचार के प्रतीक के रूप में याद किया जाएगा और इसका नुकसान सीधे जनता के विश्वास को होगा।