तरुण कौशिक, संपादक, सर्वव्यापी
वर्षों से उपेक्षा और शोषण का सामना कर रहे छत्तीसगढ़ के नगर सैनिक एवं होमगार्ड जवानों के लिए आखिरकार न्याय की किरण दिखाई दी है। लंबे समय से अपनी मांगों को लेकर संघर्ष कर रहे इन जवानों की फरियाद अब देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची, जहां से उनके पक्ष में महत्वपूर्ण फैसला आया है। इस निर्णय ने प्रदेश के हजारों होमगार्ड जवानों में नई उम्मीद जगा दी है।जानकारी के अनुसार, छत्तीसगढ़ के नगर सैनिक होमगार्ड जवान लंबे समय से यह मांग करते आ रहे थे कि उन्हें पुलिस कर्मचारियों की तरह मान-सम्मान, उचित वेतन और सेवा से जुड़े अधिकार दिए जाएं। लेकिन उनकी यह मांग वर्षों तक सरकार के स्तर पर अनसुनी होती रही। कई बार ज्ञापन, आंदोलन और अधिकारियों से गुहार लगाने के बावजूद उनकी समस्याओं का समाधान नहीं हो पाया।प्रदेश के अलग-अलग जिलों में तैनात होमगार्ड जवानों का कहना था कि वे भी कानून-व्यवस्था बनाए रखने, वीआईपी ड्यूटी, चुनाव, त्योहारों और आपदा जैसी परिस्थितियों में पुलिस के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करते हैं। इसके बावजूद उन्हें न तो पुलिस कर्मियों के समान सुविधाएं मिलती हैं और न ही सम्मानजनक वेतन।इसी उपेक्षा और लगातार हो रहे शोषण के खिलाफ आखिरकार मामला सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा। अदालत ने सुनवाई के दौरान माना कि होमगार्ड जवान भी सुरक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और उनके साथ भेदभाव नहीं होना चाहिए। अदालत के इस फैसले ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि समान कार्य करने वालों के साथ समान व्यवहार और सम्मान होना चाहिए।सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले के बाद अब उम्मीद की जा रही है कि छत्तीसगढ़ सरकार को होमगार्ड जवानों की सेवा शर्तों, वेतनमान और सुविधाओं को लेकर ठोस निर्णय लेना पड़ेगा। यदि इस फैसले को पूरी गंभीरता से लागू किया जाता है तो प्रदेश के हजारों नगर सैनिकों को आर्थिक और सामाजिक सम्मान दोनों मिल सकेंगे।होमगार्ड जवानों ने इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा है कि यह केवल कानूनी जीत नहीं, बल्कि उनके आत्मसम्मान की जीत है। वर्षों से उपेक्षित रहे इन जवानों को अब उम्मीद है कि सरकार जल्द ही न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप कदम उठाएगी और उन्हें भी पुलिस कर्मचारियों के समान अधिकार और सम्मान मिलेगा।यह फैसला न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि देश भर के होमगार्ड जवानों के लिए एक मिसाल बन सकता है, जो लंबे समय से अपने अधिकारों और सम्मान के लिए संघर्ष कर रहे हैं। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि राज्य सरकार इस ऐतिहासिक निर्णय को किस तरह और कितनी जल्दी लागू करती है।