तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ राज्य के गठन के बाद प्रदेश की राजनीति में कई बड़े उतार-चढ़ाव देखने को मिले हैं। वर्ष 2000 में राज्य बनने के बाद शुरुआती दौर में कांग्रेस के पास बहुमत था और सरकार बनी, लेकिन नवगठित राज्य के पहले विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को जनता का समर्थन मिला और भाजपा ने सत्ता पर कब्जा जमाया। इसके बाद भाजपा के वरिष्ठ नेता डॉ. रमन सिंह मुख्यमंत्री बने और लगातार तीन कार्यकाल तक प्रदेश की सत्ता संभालते हुए कई विकास कार्यों को अंजाम दिया।डॉ. रमन सिंह के नेतृत्व में प्रदेश में सड़कों, बिजली, सिंचाई और जनकल्याणकारी योजनाओं के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य हुए। इसी कारण उन्हें “चावल वाले बाबा” के नाम से भी पहचान मिली और जनता के बीच उनकी छवि मजबूत बनी रही।हालांकि चौथे विधानसभा चुनाव से पहले डॉ. रमन सिंह ने अपने मंत्रियों और पार्टी नेताओं को एक अहम संदेश दिया था। उन्होंने साफ तौर पर कहा था कि यदि मंत्रीगण कमीशनखोरी से दूर रहें और अहंकार त्याग कर जनता के बीच काम करें, तो भाजपा की सरकार फिर से बन सकती है। लेकिन बताया जाता है कि इस चेतावनी को गंभीरता से नहीं लिया गया। कई मंत्रियों पर भ्रष्टाचार और जनसंपर्क से दूरी के आरोप लगे, जिसका सीधा असर चुनाव परिणामों पर पड़ा और जनता ने अपना आशीर्वाद कांग्रेस पार्टी को दे दिया।इसके बाद कांग्रेस की सरकार बनी और भूपेश बघेल मुख्यमंत्री बने। कांग्रेस सरकार ने अपने पांच साल के कार्यकाल में कई योजनाएं चलाईं, लेकिन इस दौरान भी सरकार पर विभिन्न घोटालों और अनियमितताओं के आरोप लगते रहे। कथित घोटालों की जांच के चलते कई वरिष्ठ अफसर, पूर्व मंत्री और कारोबारी जांच के दायरे में आए।
वर्तमान में प्रदेश में भाजपा की विष्णु देव साय सरकार सत्ता में है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी तेज है कि सरकार और जनता के बीच दूरी बढ़ती नजर आ रही है। विभिन्न वर्गों के लोग अपनी समस्याओं को लेकर असंतोष व्यक्त करते दिखाई दे रहे हैं।
सरकार की कुछ योजनाएं, जैसे महतारी वंदन योजना और किसानों को मिलने वाला बोनस, समय पर मिलने के कारण जनता के बीच चर्चा में हैं और इन्हें सरकार की सकारात्मक पहल माना जा रहा है।
हालांकि राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि भाजपा के कुछ नेता स्वयं भी सरकार की कार्यशैली से पूरी तरह संतुष्ट नहीं दिखाई दे रहे हैं।
प्रदेश की राजनीति में बदलते समीकरणों के बीच एक बार फिर यह सवाल उठने लगा है कि क्या सत्ताधारी दल जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतर पाएगा, या फिर आने वाले समय में छत्तीसगढ़ की सियासत एक और बड़े बदलाव की ओर बढ़ेगी।