तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ की न्यायधानी बिलासपुर इन दिनों एक दिलचस्प लेकिन चर्चित संयोग को लेकर सुर्खियों में है। प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में ‘अग्रवाल’ और ‘साहू’ सरनेम का ऐसा संगम देखने को मिल रहा है कि अब यह महज संयोग नहीं, बल्कि चर्चा और व्यंग्य का बड़ा विषय बन चुका है।शहर के प्रमुख पदों पर नजर डालें तो बिलासपुर विधायक अमर अग्रवाल, कलेक्टर संजय अग्रवाल और जिला पंचायत सीईओ संदीप अग्रवाल-तीनों ही अहम जिम्मेदारियों में हैं। वहीं दूसरी ओर केंद्रीय राज्य मंत्री तोखन साहू, उप मुख्यमंत्री अरुण साव, जिला मुख्यालय के एसडीएम मनीष साहू और जिला मुख्यालय के तहसीलदार प्रकाश चंद साहू भी सत्ता और प्रशासन की महत्वपूर्ण कमान संभाले हुए हैं।अब हालात ऐसे बन गए हैं कि यह “सरनेम समीकरण” सिर्फ आम जनता की चाय-चर्चा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह मुद्दा जिला प्रशासन से लेकर राज्य प्रशासन और राजनीतिक गलियारों तक में चर्चा का विषय बन गया है। कई लोग इसे संयोग मान रहे हैं, तो कुछ इसे व्यवस्था की एक झलक बताकर सवाल भी उठा रहे हैं।शहर में लोग व्यंग्य करते हुए कहते हैं-“बिलासपुर में पोस्टिंग चाहिए तो योग्यता के साथ सरनेम भी मैच होना चाहिए!” हालांकि यह सिर्फ एक मजाकिया टिप्पणी है, लेकिन यह बात इस पूरे घटनाक्रम की चर्चा को और हवा दे रही है।विशेषज्ञों और राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह पूरी तरह संयोग हो सकता है, लेकिन जब एक ही समय में इतने महत्वपूर्ण पदों पर एक ही तरह के सरनेम हावी दिखें, तो स्वाभाविक रूप से सवाल और चर्चाएं जन्म लेती हैं। यह स्थिति पारदर्शिता, अवसर की समानता और प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों को भी अप्रत्यक्ष रूप से सामने लाती है।हालांकि, प्रशासनिक स्तर पर इस विषय को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा और इसे महज इत्तेफाक बताया जा रहा है। वहीं दूसरी ओर आम जनता का साफ कहना है कि उन्हें नाम या सरनेम से ज्यादा मतलब काम से है, अगर विकास कार्य तेजी से हो रहे हैं और समस्याओं का समाधान मिल रहा है, तो सरनेम कोई मुद्दा नहीं है।फिलहाल, बिलासपुर में “अग्रवाल-साहू गढ़” की चर्चा ने एक अलग ही रंग ले लिया है-जहां व्यंग्य, राजनीति और प्रशासन एक साथ नजर आ रहे हैं। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह चर्चा सिर्फ मजाक बनकर रह जाती है या फिर किसी बड़े विमर्श का रूप लेती है।