तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ का प्रशासनिक तंत्र इन दिनों बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। इस बदलाव के केंद्र में हैं मुख्य सचिव विकास शील, जिनके सख्त तेवरों ने वर्षों से ढीले पड़े सिस्टम में हलचल मचा दी है। शासन ने अब साफ संकेत दे दिया है कि फर्जीवाड़ा, अनियमित नियुक्ति और भ्रष्टाचार को किसी भी स्तर पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।सूत्रों के मुताबिक, लंबे समय से दबे फर्जी नियुक्ति और अनुकम्पा नियुक्ति में गड़बड़ी के मामलों को फिर से खोला जा रहा है। कई विभागों में ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां अपात्र लोगों ने फर्जी दस्तावेजों के सहारे नौकरी हासिल की और वर्षों तक सिस्टम का हिस्सा बने रहे। अब इन सभी मामलों की गहन जांच के निर्देश जारी कर दिए गए हैं।सामान्य प्रशासन विभाग के जरिए सभी विभागों को स्पष्ट आदेश दिए गए हैं कि बीते वर्षों में हुई नियुक्तियों की समीक्षा की जाए। खासकर अनुकम्पा नियुक्ति, दैनिक वेतनभोगियों के नियमितीकरण और संविदा भर्ती में पारदर्शिता की जांच होगी। जहां भी गड़बड़ी मिलेगी, वहां सीधे सेवा समाप्ति के साथ एफआईआर दर्ज करने की तैयारी है।प्रशासनिक कसावट के इस अभियान में कामचोर कर्मचारियों को भी निशाने पर लिया गया है। कई जिलों से आई रिपोर्ट में सामने आया है कि कुछ कर्मचारी बिना काम किए वेतन ले रहे हैं, समय पर कार्यालय नहीं पहुंचते और फाइलों को अनावश्यक रूप से लंबित रखते हैं। इस पर मुख्य सचिव ने साफ शब्दों में “परफॉर्म या पनिश” का संदेश दिया है, जिससे प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मच गया है।सिर्फ कर्मचारी ही नहीं, बल्कि उच्च स्तर के अधिकारियों पर भी शिकंजा कसने की रणनीति तैयार है। आय से अधिक संपत्ति, ठेकों में कमीशनखोरी और नियमों के खिलाफ फैसलों से जुड़े मामलों की फाइलें फिर से सक्रिय की जा रही हैं। उच्च स्तर पर निगरानी के लिए विशेष टीम गठित करने की योजना भी बन रही है, जो सीधे मुख्य सचिव कार्यालय को रिपोर्ट करेगी।इसके साथ ही वर्षों से एक ही स्थान पर जमे अधिकारियों को हटाने की तैयारी भी तेज हो गई है। ऐसे अधिकारियों पर स्थानीय नेटवर्क बनाकर मनमानी करने के आरोप रहे हैं। बड़े पैमाने पर तबादलों के जरिए “कंफर्ट जोन” खत्म कर प्रशासन में पारदर्शिता और निष्पक्षता लाने की कोशिश की जा रही है।विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह अभियान लगातार और निष्पक्ष रूप से लागू होता है, तो यह छत्तीसगढ़ के प्रशासनिक ढांचे में ऐतिहासिक बदलाव ला सकता है। इससे न केवल शासन की विश्वसनीयता बढ़ेगी, बल्कि आम जनता को भी सीधे राहत मिलेगी।हालांकि, सबसे बड़ी चुनौती इस मुहिम की निरंतरता है। पहले भी कई बार सख्ती की शुरुआत हुई, लेकिन समय के साथ कार्रवाई धीमी पड़ गई। ऐसे में अब सबकी नजर इस बात पर है कि क्या विकास शील की यह सख्ती कागजों से निकलकर जमीनी हकीकत बनेगी।फिलहाल इतना तय है कि छत्तीसगढ़ का प्रशासनिक सिस्टम एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है—और इस बदलाव की कमान संभाले हुए हैं मुख्य सचिव, जिनकी सख्ती ने पूरे तंत्र को सतर्क कर दिया है। अब देखना यह है कि यह “कसावट अभियान” भ्रष्टाचार की जड़ों तक पहुंच पाता है या नहीं।