तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
बिलासपुर संभाग अंतर्गत गौरेला–पेंड्रा–मरवाही जैसे संवेदनशील और उभरते जिले में कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी संभालना किसी भी अधिकारी के लिए चुनौतीपूर्ण होता है। ऐसे में 2014 बैच के प्रमोटी आईपीएस अधिकारी के रूप में जिले के पुलिस अधीक्षक मनोज खिलारी ने यह साबित किया है कि “प्रमोशन” केवल एक पद नहीं, बल्कि अनुभव और जमीनी समझ का सम्मान होता है।प्रमोशन के जरिए आईपीएस सेवा में आए अधिकारियों को अक्सर कम करके आंकने की प्रवृत्ति देखने को मिलती है, लेकिन यह धारणा इस जिले में पूरी तरह गलत साबित होती नजर आ रही है। यहां के पुलिस अधीक्षक ने अपने कार्यों से यह दिखाया है कि प्रशासनिक कुशलता केवल किताबों से नहीं, बल्कि वर्षों की मैदानी सेवा और परिस्थितियों से लड़कर हासिल होती है।जिले में अपराध नियंत्रण, कानून-व्यवस्था की मजबूती और पुलिस की आमजन तक पहुंच बढ़ाने जैसे मुद्दों पर उनकी सक्रियता साफ दिखाई देती है। छोटी-छोटी घटनाओं पर भी त्वरित प्रतिक्रिया और संवेदनशीलता के साथ कार्रवाई ने आम नागरिकों में विश्वास का माहौल तैयार किया है। यह वही विश्वास है, जो किसी भी जिले की सुरक्षा व्यवस्था की असली ताकत होता है।विशेष रूप से ग्रामीण और दूरस्थ इलाकों में पुलिस की उपस्थिति और संवाद को मजबूत करने के लिए किए गए प्रयास सराहनीय हैं। प्रमोटी अधिकारी होने के नाते उन्हें स्थानीय तंत्र और सामाजिक संरचना की बेहतर समझ है, जिसका लाभ सीधे तौर पर कानून-व्यवस्था सुधार में देखने को मिल रहा है।आलोचना हर व्यवस्था का हिस्सा होती है, लेकिन जब काम बोलता है तो सवाल खुद ही कमजोर पड़ जाते हैं। गौरेला–पेंड्रा–मरवाही में पुलिस अधीक्षक मनोज खिलारी का कार्यकाल इसी दिशा में एक उदाहरण बनकर उभर रहा है, जहां पद की नहीं, बल्कि प्रदर्शन की चर्चा हो रही है।अंततः यह कहना गलत नहीं होगा कि अनुभव, समर्पण और जमीनी जुड़ाव—इन तीन स्तंभों पर खड़ा यह नेतृत्व जिले की सुरक्षा व्यवस्था को नई दिशा देने में सक्षम है। प्रमोटी आईपीएस होने का टैग यहां किसी कमजोरी का नहीं, बल्कि एक मजबूत प्रशासनिक नींव का प्रतीक बन चुका