तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

बिलासपुर संभाग अंर्तगत गौरेला पेंड्रा मरवाही जिले के वनमंडल मरवाही के कार्यालय से जारी एक आदेश ने सूचना के अधिकार को लेकर फिर सवाल खड़े कर दिए हैं। आवेदक द्वारा केंद्रीय नर्सरी योजना के अंतर्गत चिचगोहना में कार्यरत कर्मचारियों/मजदूरों की जानकारी मांगी गई थी, लेकिन विभाग ने इसे “व्यक्तिगत जानकारी” बताकर देने से साफ इनकार कर दिया।जारी पत्र के अनुसार, आवेदक ने सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत दिनांक 06 अप्रैल 2026 को आवेदन प्रस्तुत कर केंद्रीय नर्सरी योजना में स्वीकृत तिथि से अब तक कार्यरत कर्मचारियों और मजदूरों की जानकारी मांगी थी। यह जानकारी प्रमाणित प्रति के रूप में चाही गई थी, ताकि योजना के क्रियान्वयन और उसमें लगे मानव संसाधनों की पारदर्शिता सामने आ सके।हालांकि, वन विभाग ने अपने जवाब में कहा कि मांगी गई जानकारी “तृतीय पक्ष” से संबंधित व्यक्तिगत सूचना है, जिसे अधिनियम की धारा 8(1)(d), 8(1)(e) और 8(1)(j) के तहत संरक्षित किया गया है। इसी आधार पर विभाग ने सूचना देने से इंकार कर दिया और आवेदन को निरस्त कर दिया।वहीं इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि सरकारी योजना में कार्यरत कर्मचारियों और मजदूरों की जानकारी कैसे “निजी” हो सकती है? जब यह कार्य सरकारी बजट और सार्वजनिक धन से संचालित हो रहा है, तो इसमें लगे मानव संसाधनों की जानकारी सार्वजनिक दायरे में आनी चाहिए।सूचना के अधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि इस तरह की दलील देकर विभाग पारदर्शिता से बचने की कोशिश कर रहा है। यदि मजदूरों और कर्मचारियों की जानकारी ही सार्वजनिक नहीं की जाएगी, तो योजनाओं में संभावित अनियमितताओं और फर्जीवाड़े की जांच कैसे संभव होगी?वहीं अब आवेदक अब इस मामले को प्रथम अपीलीय अधिकारी के समक्ष ले जाने की तैयारी में है। माना जा रहा है कि यह मामला आगे बढ़ने पर वन विभाग की कार्यप्रणाली और आरटीआई के पालन को लेकर बड़ी बहस खड़ी कर सकता है।वन विभाग का यह रवैया एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या आरटीआई का उद्देश्य वास्तव में पूरा हो पा रहा है, या फिर विभागीय नियमों की आड़ में जानकारी छुपाने का खेल जारी है।