तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ की सियासत में भ्रष्टाचार अब केवल आरोप-प्रत्यारोप का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह “चयनात्मक कार्रवाई” बनाम “राजनीतिक संरक्षण” की बहस में बदल चुका है। केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार पर विपक्ष लगातार यह आरोप लगा रहा है कि कांग्रेस शासित राज्यों या विपक्षी नेताओं के मामलों में प्रवर्तन निदेशालय (ED) और केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) सक्रिय हो जाते हैं, लेकिन भाजपा शासित राज्यों या पूर्व सरकारों के मामलों में वही सख्ती नजर नहीं आती। यही सवाल अब छत्तीसगढ़ की राजनीति में भी प्रमुख बहस का केंद्र बन गया है।पिछले दो दशकों के राजनीतिक घटनाक्रम पर नजर डालें तो डॉ. रमन सिंह के 15 साल के कार्यकाल (2003–2018) के दौरान कई कथित घोटाले सुर्खियों में रहे। इनमें सबसे चर्चित नागरिक आपूर्ति निगम (NAN) घोटाला रहा, जिसे विपक्ष ने हजारों करोड़ रुपये के राशन घोटाले के रूप में उठाया। गरीबों के लिए निर्धारित खाद्यान्न में गड़बड़ी, कमीशनखोरी और कथित राजनीतिक संरक्षण के आरोपों ने उस समय सियासी माहौल को गर्म रखा। पनामा पेपर्स में परिवार से जुड़े नाम सामने आने से विवाद और गहराया, जबकि PDS, चिटफंड, मोवा धान, कुनकुरी चावल और आंखफोड़वा कांड जैसे मामलों ने शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली पर लगातार सवाल खड़े किए। विपक्ष का आरोप रहा कि इन मामलों में अपेक्षित स्तर की केंद्रीय जांच एजेंसियों की सक्रियता नहीं दिखी।साल 2018 में सत्ता परिवर्तन के बाद भूपेश बघेल के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार आई, और इसके साथ ही कई नए कथित घोटाले राष्ट्रीय स्तर तक चर्चा में आए। इस दौर में ED और EOW की सक्रियता लगातार देखने को मिली। 2100 करोड़ रुपये के कथित शराब घोटाले, महादेव सट्टा ऐप घोटाले, कोयला परिवहन में अवैध वसूली, CG PSC भर्ती विवाद और CSMCL ओवरटाइम घोटाले जैसे मामलों में जांच एजेंसियों की कार्रवाई और गिरफ्तारियों ने राजनीतिक माहौल को और गरमा दिया। कांग्रेस का आरोप रहा कि इन जांचों का इस्तेमाल राजनीतिक दबाव बनाने के लिए किया गया, जबकि भाजपा इसे भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कार्रवाई बताती रही।साल 2023 में भाजपा की वापसी के बाद विष्णु देव साय के नेतृत्व में सरकार बनी, जिसने ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अपनाने का दावा किया। लेकिन 2025-26 में सामने आए धान घोटाले, आंगनबाड़ी साड़ी विवाद, पंचायत स्तर पर वित्तीय अनियमितताएं, अमानक चावल आपूर्ति और अवैध प्लॉटिंग जैसे मुद्दों ने विपक्ष को एक बार फिर हमलावर बना दिया है। बेमेतरा और कबीरधाम जिलों में धान गायब होने के मामलों ने प्रशासनिक निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं, वहीं पंचायत सोशल ऑडिट में सामने आए करोड़ों रुपये के गबन ने जमीनी स्तर पर भ्रष्टाचार की गहराई को उजागर किया है।यहीं से सियासत का सबसे तीखा सवाल सामने आता है—जब कांग्रेस सरकार के दौरान सामने आए मामलों में ED और CBI जैसी केंद्रीय एजेंसियां सक्रिय हो जाती हैं, तो भाजपा सरकारों के कार्यकाल से जुड़े मामलों में वैसी ही सख्ती क्यों नहीं दिखती? विपक्ष इसे “राजनीतिक चयनात्मकता” और “एजेंसियों के दुरुपयोग” का उदाहरण बता रहा है, जबकि भाजपा का कहना है कि उसकी सरकारें खुद ही कार्रवाई कर रही हैं और दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।छत्तीसगढ़ की राजनीति में यह बहस अब केवल राज्य तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि केंद्र बनाम राज्य और एजेंसियों की निष्पक्षता जैसे बड़े सवालों को जन्म दे रही है। आम जनता के बीच भी यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई वास्तव में निष्पक्ष है या फिर यह सत्ता के समीकरणों के अनुसार तय होती है।फिलहाल, आरोपों और जवाबी दावों के इस दौर में सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या छत्तीसगढ़ में सामने आए सभी कथित घोटालों की निष्पक्ष, पारदर्शी और समान रूप से जांच हो पाएगी, या फिर यह मुद्दा भी राजनीतिक लाभ-हानि के तराजू में ही उलझा रहेगा। जनता अब केवल आरोप नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई और स्पष्ट जवाब चाहती है।