भीषण गर्मी में ‘मैदानी हकीकत’ का सामना: कलेक्टर संजय अग्रवाल का अलग अंदाज़, लेकिन क्या इससे बदलेगा सिस्टम?

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तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ की न्यायधानी बिलासपुर में प्रशासनिक कार्यशैली का एक अलग दृश्य उस वक्त सामने आया, जब जिला कलेक्टर संजय अग्रवाल और जिला पंचायत सीईओ संदीप अग्रवाल ग्राम पंचायत छतौना में पीपल के पेड़ की छांव तले बैठकर आम जनता की समस्याएं सुनते नजर आए। तेज धूप और उमस भरे मौसम के बीच अधिकारियों का इस तरह खुले में बैठकर जनसुनवाई करना एक ओर जहां संवेदनशीलता का संकेत देता है, वहीं यह सवाल भी खड़ा करता है कि क्या इस प्रतीकात्मक पहल से जमीनी स्तर की समस्याओं का स्थायी समाधान संभव हो पाएगा?तस्वीर में साफ देखा जा सकता है कि अधिकारी जमीन पर बिछे मंच पर ग्रामीणों के बीच बैठकर उनकी शिकायतें सुन रहे हैं। आसपास मौजूद ग्रामीण, महिलाएं और स्थानीय जनप्रतिनिधि अपनी-अपनी समस्याएं लेकर पहुंचे हैं। यह दृश्य प्रशासन और जनता के बीच दूरी कम करने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है। खास बात यह रही कि कलेक्टर संजय अग्रवाल ने न सिर्फ गांव में पेड़ के नीचे बैठकर समस्याएं सुनीं, बल्कि उनकी कार्यशैली को लेकर यह भी चर्चा में है कि वे अपने वातानुकूलित कार्यालय कक्ष से दूरी बनाकर साधारण पंखे में काम करना पसंद करते हैं।जानकारी के मुताबिक, कलेक्टर का यह सादगी भरा रवैया सिर्फ दफ्तर तक सीमित नहीं है। उनके वाहन चालक का कहना है कि वे सफर के दौरान भी एसी का उपयोग नहीं करते, बल्कि गाड़ी की खिड़कियां खोलकर सामान्य वातावरण में यात्रा करना पसंद करते हैं। प्रशासनिक हलकों में इसे एक सकारात्मक संदेश के रूप में देखा जा रहा है, जहां अधिकारी खुद को आमजन के जीवन स्तर से जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं।हालांकि, इस पूरी कवायद के बीच एक बड़ा सवाल भी उभरता है,क्या इस तरह की पहलें केवल छवि निर्माण तक सीमित रह जाएंगी, या फिर इससे सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली में वास्तविक बदलाव भी आएगा? क्योंकि जमीनी हकीकत यह है कि राजस्व, पंचायत, नगरीय निकाय और अन्य विभागों में लंबित मामलों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। आम नागरिकों को छोटी-छोटी समस्याओं के समाधान के लिए महीनों तक कार्यालयों के चक्कर काटने पड़ते हैं।लोगों का मानना है कि जनसुनवाई और मौके पर समाधान की पहल सराहनीय जरूर है, लेकिन इसे निरंतर और प्रभावी बनाने के लिए सिस्टम में जवाबदेही तय करना ज्यादा जरूरी है। यदि अधिकारियों की यह सक्रियता केवल कुछ चुनिंदा आयोजनों तक सीमित रहती है, तो इसका असर भी सीमित ही रहेगा। वहीं अगर इस मॉडल को नियमित प्रक्रिया का हिस्सा बनाया जाए, तो यह प्रशासनिक सुधार की दिशा में बड़ा कदम साबित हो सकता है।बिलासपुर में कलेक्टर और सीईओ का यह प्रयास एक सकारात्मक संकेत देता है कि प्रशासन जनता के बीच जाकर उनकी समस्याओं को समझने की कोशिश कर रहा है। लेकिन असली कसौटी यही होगी कि इन जनसुनवाईयों में उठे मुद्दों का समाधान कितनी तेजी और पारदर्शिता के साथ होता है। फिलहाल, पीपल की छांव तले बैठा यह प्रशासनिक दृश्य चर्चा में जरूर है,अब देखना होगा कि यह पहल बदलाव की ठंडी छांव बनती है या फिर सिर्फ एक क्षणिक तस्वीर बनकर रह जाती है।


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