मंथन मीटिंग हॉल कलेक्ट्रोरेट बिलासपुर—राज्य की पहचान पर सवाल, ‘छत्तीसगढ़’ क्यों गायब?

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तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ की न्यायधानी बिलासपुर जिले के कलेक्ट्रोरेट बिलासपुर स्थित मंथन मीटिंग हॉल की नेमप्लेट इन दिनों एक गंभीर प्रशासनिक चूक के कारण चर्चा में है। हॉल में प्रमुखता से “Manthan Meeting Hall, Collectorate Bilaspur” लिखा गया है, लेकिन इसके बाद राज्य का नाम “छत्तीसगढ़” नहीं जोड़ा गया है।यह महज एक शब्द की कमी नहीं, बल्कि उस पहचान की अनदेखी है, जिसके आधार पर पूरा प्रशासनिक ढांचा खड़ा है। सरकारी कार्यालयों में नामपट्ट केवल सूचना देने के लिए नहीं होते, बल्कि वे उस राज्य की औपचारिक और संवैधानिक उपस्थिति का प्रतिनिधित्व करते हैं। ऐसे में छत्तीसगढ़ का उल्लेख न होना सीधे-सीधे प्रशासनिक गंभीरता पर सवाल खड़ा करता है।स्थानीय नागरिकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों के बीच इस मुद्दे को लेकर असंतोष बढ़ता दिख रहा है। उनका कहना है कि जब कलेक्ट्रोरेट जैसे उच्चस्तरीय कार्यालय में ही राज्य का नाम अधूरा रह जाए, तो यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि व्यवस्था की प्राथमिकताओं पर भी प्रश्नचिह्न है।कुछ लोगों का यह भी मानना है कि यह घटना उस मानसिकता को उजागर करती है, जहां अंग्रेज़ी शब्दों और औपचारिक नामों को प्राथमिकता दी जाती है, जबकि राज्य की मूल पहचान पीछे छूट जाती है। ऐसे समय में, जब सरकार क्षेत्रीय अस्मिता और सांस्कृतिक गौरव को बढ़ावा देने की बात करती है, यह चूक और भी अधिक गंभीर हो जाती है।प्रशासनिक प्रोटोकॉल के अनुसार, किसी भी सरकारी भवन या कक्ष के नाम में पूर्ण भौगोलिक पहचान—शहर के साथ राज्य का नाम—स्पष्ट रूप से अंकित होना चाहिए, ताकि बाहरी आगंतुकों और आम नागरिकों के लिए भी स्पष्टता बनी रहे।अब इस पूरे मामले में निगाहें टिकी हैं जिले के मुखिया संजय अग्रवाल पर। क्या सर्वव्यापी के इस खबर को संज्ञान में लेकर तुरंत सुधार के निर्देश देंगे? क्या “Collectorate Bilaspur” के साथ “Chhattisgarh” जोड़कर इस चूक को दुरुस्त किया जाएगा?जनता के मन में उठते सवाल:क्या सरकारी कार्यालयों में राज्य की पहचान इतनी गौण हो गई है?क्या यह सिर्फ एक तकनीकी गलती है या लापरवाही का उदाहरण?क्या प्रशासन इसे सुधारकर एक सकारात्मक संदेश देगा?फिलहाल, यह मुद्दा केवल एक नेमप्लेट तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह राज्य की पहचान, प्रशासनिक जिम्मेदारी और संवेदनशीलता की परीक्षा बन चुका है। अब देखना होगा कि प्रशासन इस पर कितनी गंभीरता दिखाता है और कब तक मंथन मीटिंग हॉल की नेमप्लेट में “छत्तीसगढ़” को उसका उचित स्थान मिलता है।


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