.तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ की प्रशासनिक कार्यशैली पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। राज्यपाल रमेन डेका को खुद विकासखण्ड स्तर की समीक्षा बैठक लेकर अधिकारियों को जनता के बीच जाने, संवाद करने, जल संरक्षण, नशा नियंत्रण और यातायात व्यवस्था सुधारने जैसे बुनियादी निर्देश देने पड़ रहे हैं। यह वही जिम्मेदारी है, जो सामान्यतः मुख्यमंत्री, विभागीय मंत्री और शीर्ष प्रशासनिक अधिकारियों की मानी जाती है।
सवाल सीधा है—क्या मुख्यमंत्री विष्णु देव साय, पंचायत मंत्री विजय शर्मा और पंचायत विभाग की प्रमुख सचिव निहारिका सिंहबारिक अपने दायित्वों से पीछे हट गए हैं, या फिर जमीनी हकीकत जानने की इच्छाशक्ति ही खत्म हो चुकी है?राज्यपाल डेका ने साफ तौर पर कहा कि अधिकारी जनता के बीच जाएं, समस्याएं सुनें और योजनाओं का फीडबैक लें। उन्होंने जल संरक्षण के लिए ग्राम पंचायत स्तर पर डबरी निर्माण, रेन वॉटर हार्वेस्टिंग, वृक्षारोपण और फसल विविधीकरण जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर जोर दिया। लेकिन यह चिंताजनक है कि इन मूलभूत विषयों पर पहल कराने के लिए राज्यपाल को खुद हस्तक्षेप करना पड़ रहा है।दरअसल, यह पहली बार नहीं है जब राज्यपाल ने ऐसी सक्रियता दिखाई हो। इससे पहले भी वे संभागीय मुख्यालयों में जाकर समीक्षा बैठकें ले चुके हैं। यह संकेत देता है कि प्रशासनिक तंत्र या तो निष्क्रिय हो चुका है या फिर जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग केवल औपचारिकता निभाने तक सीमित हो गए हैं।यातायात अव्यवस्था, नशे की बढ़ती समस्या और जल संकट जैसे मुद्दे सीधे तौर पर सरकार और स्थानीय प्रशासन की जिम्मेदारी हैं। बावजूद इसके, जब राज्यपाल को भारी वाहनों के नियंत्रण, हेलमेट जागरूकता और नशे पर सख्ती जैसे निर्देश देने पड़ें, तो यह सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल खड़ा करता है।सबसे बड़ा प्रश्न यही है—क्या छत्तीसगढ़ में शासन चलाने का दायित्व अब संवैधानिक प्रमुख को निभाना पड़ेगा? अगर राज्यपाल ही जमीनी समीक्षा करेंगे, योजनाओं की मॉनिटरिंग करेंगे और अधिकारियों को दिशा देंगे, तो फिर मुख्यमंत्री और संबंधित मंत्रियों की भूमिका क्या रह जाती है?यह पूरा घटनाक्रम केवल एक बैठक नहीं, बल्कि शासन व्यवस्था की कमजोर होती पकड़ का संकेत है। अब देखना यह होगा कि मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और उनकी टीम इस संदेश को गंभीरता से लेते हैं या फिर राज्यपाल को ही आगे भी “फील्ड कमांडर” की भूमिका निभानी पड़ेगी।