तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ के राज्यपाल रमेन डेका ने बलरामपुर जिले के कुसमी विकासखंड अंतर्गत ग्राम धनेशपुर में दिव्यांग बच्चों की असामान्य रूप से अधिक संख्या को गंभीरता से लेते हुए समाज कल्याण विभाग और स्वास्थ्य विभाग को संयुक्त रूप से विशेष जांच शिविर आयोजित करने के निर्देश दिए हैं। राज्यपाल के इस हस्तक्षेप ने जहां प्रशासनिक सक्रियता को उजागर किया है, वहीं दूसरी ओर राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर भी सीधे सवाल खड़े कर दिए हैं।राज्यपाल ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि दोनों विभाग समन्वय के साथ गांव में विशेष शिविर आयोजित करें, जिसमें दिव्यांग बच्चों की समग्र स्वास्थ्य जांच, आवश्यक परीक्षण और उनकी स्थिति का वैज्ञानिक आकलन किया जाए। साथ ही टीम को घर-घर सर्वे कर पात्र बच्चों एवं नागरिकों के दिव्यांगता प्रमाण पत्र और दिव्यांग कार्ड बनाने की प्रक्रिया सुनिश्चित करने के लिए कहा गया है।लेकिन बड़ा सवाल यह है कि आखिरकार स्थिति इतनी गंभीर कैसे हो गई कि राज्यपाल को सीधे हस्तक्षेप करना पड़ा? क्या स्वास्थ्य और समाज कल्याण विभाग अब तक इस संवेदनशील मुद्दे से अनजान थे, या फिर इसे नजरअंदाज किया जा रहा था?राज्यपाल ने अधिकारियों को प्रभावित परिवारों को हर संभव सहायता देने, बच्चों के उपचार, पुनर्वास और सामाजिक सशक्तिकरण के लिए ठोस कार्ययोजना तैयार करने के निर्देश दिए हैं। यह पहल निश्चित रूप से सराहनीय है, लेकिन इसके साथ ही सरकार की जवाबदेही भी तय होना जरूरी है।मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की सरकार पर अब विपक्ष ही नहीं, बल्कि आम जनता भी सवाल उठा रही है कि जब जमीनी स्तर पर ऐसी गंभीर स्थिति मौजूद थी, तब सरकार और उसके जिम्मेदार विभाग क्या कर रहे थे? क्या यह प्रशासनिक लापरवाही का मामला है या फिर योजनाओं के क्रियान्वयन में बड़ी चूक?धनेशपुर का यह मामला अब केवल एक गांव तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह पूरे प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था और सामाजिक सुरक्षा तंत्र की पोल खोलता नजर आ रहा है। राज्यपाल की सक्रियता ने जहां उम्मीद जगाई है, वहीं मुख्यमंत्री और उनकी सरकार के लिए यह एक बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक सवाल बनकर उभरा है,क्या अब ठोस कार्रवाई होगी या फिर यह मामला भी केवल कागजों तक सीमित रह जाएगा?