भारत के जनगणना म छत्तीसगढ़ी भासा ल पूरा सम्मान मिलना चाही।

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अनिल कुमार पाली, सर्वव्यापी

भारत के जनगणना म छत्तीसगढ़ी भासा ल उचित महत्व मिलना आज केवल सांस्कृतिक आग्रह के विषय नइ रहिस, बल्कि ये एक गम्भीर संवैधानिक, सामाजिक अउ नीतिगत सवाल बन गे हव। छत्तीसगढ़ी भासा, जेन ल लाखों-करोड़ों लोगन अपन दैनंदिन जीवन म उपयोग करथें, अपन अलग पहचान, समृद्ध परंपरा अउ गहरी जड़ के बावजूद आज घलो आधिकारिक रूप म ओ सम्मान नइ पा सकीस जेन के वो हकदार हे। जनगणना, जेन देश के सामाजिक, आर्थिक अउ सांस्कृतिक संरचना के आधार तय करथे, ओमा छत्तीसगढ़ी के सही प्रतिनिधित्व नइ होना, सीधे-सीधे ए भासा के अस्तित्व ल कमजोर करना के बराबर हे।भारत के जनगणना प्रक्रिया के मूल उद्देश्य ये होथे कि देश के हर वर्ग, हर समुदाय अउ हर भाषा के सटीक आंकड़ा एकत्र होय, ताकि शासन-प्रशासन नीति निर्माण म सही निर्णय ले सकय। फेर जब छत्तीसगढ़ी जइसन व्यापक रूप से बोले जाथे भासा ल अलग से दर्ज नइ करके हिंदी के अंतर्गत जोड़ दे जाथे, तब ए प्रक्रिया के निष्पक्षता अउ सटीकता खुद संदेह के घेरे म आ जाथे। ए स्थिति केवल आंकड़ा के गड़बड़ी नइ, बल्कि एक पूरे भाषाई समुदाय के पहचान ल नजरअंदाज करना आय।संविधान के अनुच्छेद 29(1) हर नागरिक ल अपन भाषा, लिपि अउ संस्कृति के संरक्षण के अधिकार देथे। ए प्रावधान के भावना साफ हे कि भारत जइसन विविधता वाले देश म हर भाषा के अस्तित्व अउ सम्मान सुरक्षित रहना चाही। जब छत्तीसगढ़ी के स्वतंत्र पहचान जनगणना म स्पष्ट रूप से दर्ज नइ होथे, तब ए अधिकार के व्यावहारिक क्रियान्वयन अधूरा रह जाथे। एही तरह अनुच्छेद 350A म मातृभाषा म शिक्षा के प्रावधान के बात कहे गे हे, फेर जब तक सरकार के पास छत्तीसगढ़ी बोले वाला मन के सही आंकड़ा नइ होही, तब तक ए दिशा म ठोस नीति बनाना कठिन रहिथे। ए स्थिति साफ बताथे कि जनगणना म भाषा के सही दर्जा मिलना, केवल कागजी प्रक्रिया नइ, बल्कि अधिकार के आधार आय।छत्तीसगढ़ी के अलग पहचान के सवाल ल अक्सर “हिंदी के उपभाषा” कहिके कमजोर करे के प्रयास करे जाथे, जेन कि भाषाई दृष्टिकोण ले घलो उचित नइ माने जाथे। हर भाषा के अपन व्याकरण, शब्दकोश, उच्चारण अउ साहित्यिक परंपरा होथे, अउ छत्तीसगढ़ी ए सब म पूर्ण रूप से समृद्ध हे। लोकगीत, लोककथा, नाटक, कविता अउ जनजीवन म छत्तीसगढ़ी के गहरी पैठ ए बात के प्रमाण आय कि ये केवल बोलचाल के माध्यम नइ, बल्कि एक पूर्ण विकसित भाषा आय। फेर जब सरकारी स्तर म एला उपेक्षित रखे जाथे, तब धीरे-धीरे ए भासा के विकास के रास्ता घलो बाधित हो जाथे।जनगणना अधिनियम, 1948 के अंतर्गत सरकार के दायित्व हे कि देश के सामाजिक अउ सांस्कृतिक वास्तविकता के सही प्रतिबिंब प्रस्तुत करे। अगर छत्तीसगढ़ी ल अलग से दर्ज नइ करे जाही, त ए अधिनियम के मूल भावना के ही उल्लंघन होथे, काबर कि गलत या अधूरा आंकड़ा पर आधारित नीति, समाज के एक बड़े वर्ग के साथ न्याय नइ कर सकय। ए बात भी महत्वपूर्ण हे कि भाषा के आंकड़ा सीधे तौर पर शिक्षा, प्रशासन, मीडिया अउ सांस्कृतिक संरक्षण के नीति पर असर डालथे। जब छत्तीसगढ़ी के आंकड़ा कम दिखही, तब स्वाभाविक रूप से ए भासा के विकास खातिर संसाधन अउ अवसर घलो कम मिलही।आज जरूरत ए बात के हे कि छत्तीसगढ़ के लोग खुद अपन मातृभाषा के प्रति जागरूक होवय अउ जनगणना म साफ-साफ “छत्तीसगढ़ी” लिखे। साथ ही शासन-प्रशासन के जिम्मेदारी घलो बनथे कि वो जनगणना प्रक्रिया म ए भासा के स्वतंत्र पहचान सुनिश्चित करे। प्रगणक मन ल स्पष्ट निर्देश देय जावय कि छत्तीसगढ़ी ल हिंदी म मर्ज नइ करे जावय, बल्कि अलग से दर्ज करे जावय। ए कदम केवल एक प्रशासनिक सुधार नइ, बल्कि एक ऐतिहासिक न्याय होही।अंत म ये कहना गलत नइ होही कि छत्तीसगढ़ी भासा के सम्मान, छत्तीसगढ़ के लोगों के सम्मान आय। जब तक जनगणना जइसन महत्वपूर्ण प्रक्रिया म एला सही स्थान नइ मिलही, तब तक “विकास” अउ “समावेश” के दावा अधूरा ही रहही। अब समय आ गे हव कि छत्तीसगढ़ी ल केवल बोली नइ, बल्कि एक स्वतंत्र भाषा के रूप म स्वीकार करे जावय अउ एला वो सम्मान देय जावय जेन के वो सही मायने म हकदार हे। जनगणना म छत्तीसगढ़ी लिखना, केवल एक विकल्प नइ, बल्कि अपन पहचान अउ अधिकार के रक्षा के एक जरूरी कदम आय।


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