तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ के माटी, महतारी अउ पहिचान के सबले मजबूत आधार छत्तीसगढी भाषा आय। ए सिरिफ बोली नइ, बल्कि जन-जन के जीवन, संस्कृति, परंपरा अउ भावना के धड़कन आय। गांव-गांव, गली-गली म जऊन भाषा गूंजथे, वो ह छत्तीसगढी आय। फेर एही भाषा, जऊन ला राजभाषा के दर्जा मिलिस, आज राजकाज ले लगभग गायब दिखत हे—ए बात हर छत्तीसगढ़िया बर गहरी पीरा के विषय आय।प्रदेश के बिलासपुर संभाग के मुंगेली जिला आज राजनीति के नजरिया ले खास महत्व रखथे। एही धरती ले देश के केंद्रीय राज्य मंत्री तोखन साहू अउ प्रदेश के उप मुख्यमंत्री अरुण साव जइसने बड़े नेता निकले हवंय। ए बात म कोनो संदेह नइ कि ए जिला के राजनीतिक पकड़ मजबूत हे। फेर जब बात छत्तीसगढी भाषा के संरक्षण अउ सम्मान के आवत हे, त इही इलाका म चुप्पी काबर छा जाथे, ए सवाल सबले बड़ा बनके खड़ा हो जाथे।हाल म मुंगेली जिला म कलेक्टर कुंदन कुमार ऊपर छत्तीसगढी भाषा के उपयोग ला लेके जऊन विवाद उठिस, वो ह पूरा मामला ला अउ गंभीर बना दिस। भाषा के सम्मान बर आवाज उठाय वाले मन ऊपर उल्टा आरोप लगाय गिस कि वो मन शासकीय काम म बाधा डालत हवंय, शोर-शराबा करत हवंय। अब सवाल ये उठथे कि अपन भाषा बर बात करना, अपन अधिकार मांगना—का ए अपराध आय?आज के स्थिति म ये साफ दिखत हे कि छत्तीसगढी भाषा के सवाल ला प्रशासनिक नजरिया ले सही ढंग ले नइ समझे जा रहिस। जऊन लोगन अपन माटी अउ भाषा बर आवाज उठाथें, ओमन ला असामाजिक तत्व कह देना, लोकतांत्रिक व्यवस्था बर ठीक संकेत नइ आय।छत्तीसगढ़ राज्य के गठन ला 25 बरस होगे, फेर आज घलो छत्तीसगढी भाषा संविधान के आठवीं अनुसूची म जगह नइ बना पाइस। ए सिरिफ एक प्रशासनिक कमी नइ, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति के कमी के परिणाम आय। प्रदेश म 90 विधायक, 11 लोकसभा सांसद अउ राज्यसभा के सदस्य रहिथें, फेर ए सब्बो मिलके घलो अपन भाषा ला राष्ट्रीय मान्यता दिलाय बर ठोस पहल नइ कर पाइन।राजभाषा के दर्जा मिलना निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण कदम रहिस, फेर ए दर्जा सिरिफ कागज म सीमित रह जाथे त ओकर कोनो मतलब नइ रह जाथे। सरकारी दफ्तर म आज घलो हिंदी अउ अंग्रेजी के दबदबा बने हे। आदेश, पत्राचार, नोटशीट, फाइल—सब कुछ दूसर भाषा म होवत हे, जबकि छत्तीसगढी केवल समारोह अउ भाषण तक सीमित हो गे हे।शिक्षा के क्षेत्र म घलो स्थिति बहुत चिंताजनक हे। स्कूल म छत्तीसगढी के पढ़ई नाममात्र के हे। जऊन नवा पीढ़ी अपन भाषा म पढ़ई नइ करही, वो ह धीरे-धीरे अपन जड़ ले दूर हो जाही। भाषा सिरिफ संवाद के माध्यम नइ, बल्कि सोच अउ पहचान के आधार आय।छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के गठन के उद्देश्य रहिस कि छत्तीसगढी भाषा ला बढ़ावा देय जावय, सरकारी कामकाज म लागू करे जावय अउ कर्मचारियों ला प्रशिक्षित करे जावय। फेर आज सवाल उठत हे कि ए आयोग अपन उद्देश्य म कतका सफल हो पाइस?समय-समय म प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाय जाथे, कर्मचारी मन ला छत्तीसगढी सिखाय जाथे—ए दावा तो जरूर होथे, फेर जऊन कर्मचारी प्रशिक्षण लेथें, वो मन अपन दफ्तर म छत्तीसगढी म काम काबर नइ करथें? का ए प्रशिक्षण सिरिफ औपचारिकता बनके रह गे हे?कुछ जगह ले ए घलो आरोप उठत हे कि प्रशिक्षण अउ कार्यक्रम के नाम पर लाखों रुपिया खर्च होवत हे, फेर जमीन म कोनो ठोस बदलाव नजर नइ आवत। अगर ए आरोप गलत हे, त सरकार अउ आयोग ला खुलकर पारदर्शिता के साथ जानकारी देना चाही, ताकि जनता के भरोसा कायम रहय।छत्तीसगढ़ म अक्सर “छत्तीसगढ़िया सबसे बढ़िया” के नारा लगाय जाथे, फेर जब बात व्यवहार म लागू करे के आवत हे, त ए नारा खाली खोखला लगथे। जऊन माटी म छत्तीसगढ़िया जनम लेथे, ओही माटी म ओकर भाषा ला सम्मान नइ मिलय, त ए स्थिति स्वीकार योग्य नइ आय।आज के समय म जरूरत हे कि सरकार सिरिफ घोषणा नइ, बल्कि कड़ाई से नियम लागू करय। सरकारी कार्यालय म छत्तीसगढी भाषा के उपयोग अनिवार्य करे जावय। फाइल, आदेश अउ पत्राचार म धीरे-धीरे छत्तीसगढी ला स्थान देय जावय।साथ ही, शिक्षा म सुधार लाना बहुत जरूरी हे। प्राथमिक स्तर ले छत्तीसगढी माध्यम म पढ़ई शुरू करे जावय, ताकि नवा पीढ़ी अपन भाषा संग जुड़ सकय। उच्च शिक्षा म घलो छत्तीसगढी विषय के विस्तार होय के जरूरत हे।राजनीतिक नेतृत्व ला घलो गंभीरता दिखाना परही। संसद अउ विधानसभा म छत्तीसगढी के मुद्दा मजबूती ले उठाना परही। आठवीं अनुसूची म शामिल करे बर संगठित प्रयास करे बिना ए लक्ष्य हासिल नइ होही।मीडिया के भूमिका घलो महत्वपूर्ण हे। मीडिया ला चाहिए कि वो छत्तीसगढी भाषा के मुद्दा ला प्रमुखता ले उठावय, जनचेतना बढ़ावय अउ सरकार ऊपर दबाव बनावय।जनता खुद घलो अपन जिम्मेदारी समझय। घर-परिवार, समाज अउ सार्वजनिक जीवन म छत्तीसगढी के उपयोग बढ़ावय। जब समाज खुद अपन भाषा ला अपनाही, त सरकार घलो मजबूर हो जाही ओकर सम्मान करे बर।आज सवाल सिरिफ एक भाषा के नइ, बल्कि पहचान के आय। छत्तीसगढी भाषा के सम्मान, छत्तीसगढ़ के सम्मान आय। अगर अब घलो हमन चुप रहिबो, त आने वाला समय म ए भाषा कमजोर हो सकथे।अब समय आ गे हे कि छत्तीसगढ़िया समाज, नेता, अधिकारी अउ हर वर्ग के लोग एकजुट होके ए मुद्दा ला गंभीरता से लेवय। संघर्ष होही, बहस होही, फेर अंत म जीत भाषा अउ संस्कृति के होही।छत्तीसगढ़ के माटी म छत्तीसगढी के गूंज बरकरार रहय—ए जिम्मेदारी हम सब्बो के आय। अब देखना ये हे कि सरकार अउ समाज मिलके ए जिम्मेदारी ला कइसे निभाथें।