तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ में बहुचर्चित शराब घोटाले की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे सत्ता के गलियारों से लेकर नौकरशाही तक सनसनी और बेचैनी का माहौल गहराता जा रहा है। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और आर्थिक अपराध अन्वेषण एजेंसियों की कार्रवाई में अब एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी का नाम भी कथित रूप से जांच के दायरे में आने की चर्चाएं तेज हो गई हैं। सूत्रों के अनुसार लगभग 500 करोड़ रुपये से अधिक के अवैध लेन-देन, कमीशनखोरी और शराब सिंडिकेट संचालन से जुड़े कई महत्वपूर्ण दस्तावेज और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य जांच एजेंसियों के हाथ लगे हैं।बताया जा रहा है कि राज्य में वर्तमान सरकार के कार्यकाल के दौरान शराब बिक्री और वितरण व्यवस्था में एक संगठित नेटवर्क सक्रिय रहा, जिसमें कथित तौर पर कुछ प्रभावशाली अफसर, कारोबारी और राजनीतिक संरक्षण प्राप्त लोगों की भूमिका की जांच की जा रही है। आरोप यह भी हैं कि सरकारी शराब दुकानों की आड़ में समानांतर अवैध शराब बिक्री का तंत्र संचालित किया गया, जिससे करोड़ों रुपये की काली कमाई हुई और पूरा खेल उच्च स्तर की प्रशासनिक निगरानी तथा संरक्षण में चलता रहा।सूत्रों के मुताबिक जांच एजेंसियों को ऐसे इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड, बैंकिंग ट्रांजेक्शन, कथित डायरी नोट्स और वित्तीय दस्तावेज मिले हैं, जिनमें कई बड़े नामों का उल्लेख सामने आया है। इसी कड़ी में एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी से जुड़े वित्तीय निर्णयों, फाइल अनुमोदनों और कथित संरक्षण की भूमिका की भी गहन पड़ताल की जा रही है। हालांकि अभी तक किसी अधिकारी को आधिकारिक रूप से दोषी घोषित नहीं किया गया है, लेकिन लगातार पूछताछ और दस्तावेजी जांच ने राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मचा दिया है।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि जांच इसी दिशा में आगे बढ़ती रही, तो आने वाले दिनों में कई बड़े खुलासे संभव हैं। विपक्ष लगातार आरोप लगा रहा है कि यह केवल शराब घोटाला नहीं, बल्कि “सिस्टमेटिक करप्शन मॉडल” का उदाहरण है, जिसमें सत्ता, शराब माफिया और प्रशासनिक तंत्र की कथित सांठगांठ से सरकारी राजस्व को भारी नुकसान पहुंचाया गया।सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब केंद्र और राज्य — दोनों जगह भारतीय जनता पार्टी की सरकार है, तब इतने गंभीर आरोपों और चर्चाओं के बावजूद अब तक निर्णायक कार्रवाई क्यों नहीं दिखाई दे रही। सोशल मीडिया पर यह मामला तेजी से वायरल हो रहा है और लोग खुलकर सवाल उठा रहे हैं कि क्या राजनीतिक प्रभाव और सत्ता संरक्षण के कारण जांच की रफ्तार धीमी है अथवा बड़े नामों को बचाने की कोशिश हो रही है।इधर आम जनता के बीच भी यह चर्चा तेज है कि जनता के टैक्स, सरकारी व्यवस्था और प्रशासनिक ईमानदारी पर चोट पहुंचाने वालों के खिलाफ आखिर कब तक कठोर और निष्पक्ष कार्रवाई होगी। राज्य की राजनीति में यह मुद्दा अब केवल आर्थिक अपराध तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह नैतिक जवाबदेही, प्रशासनिक पारदर्शिता और राजनीतिक विश्वसनीयता का बड़ा प्रश्न बन चुका है।जांच एजेंसियों की अगली कार्रवाई पर पूरे प्रदेश की नजर टिकी हुई है, क्योंकि माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में कुछ और बड़े अधिकारियों, कारोबारियों और राजनीतिक रूप से प्रभावशाली लोगों से पूछताछ हो सकती है। यदि आरोप सिद्ध होते हैं, तो यह मामला छत्तीसगढ़ के इतिहास के सबसे बड़े प्रशासनिक और आर्थिक घोटालों में दर्ज हो सकता है।