तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ की राजनीति में “जनता का मुख्यमंत्री” बनने की होड़ हमेशा से रही है। पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी, डॉ. रमन सिंह और भूपेश बघेल अपने-अपने कार्यकाल में मुख्यमंत्री निवास कार्यालय में नियमित जनदर्शन लगाकर आम नागरिकों, पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और पीड़ित जनता से सीधे संवाद करते रहे। लेकिन वर्तमान मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के लगभग तीन वर्षों के कार्यकाल में मुख्यमंत्री निवास का जनदर्शन व्यवस्था लगभग पूरी तरह गायब दिखाई दे रही है।स्थिति यह है कि राज्य सरकार के निर्देश पर प्रदेश के तमाम कलेक्टर हर सप्ताह जनदर्शन लगाकर जनता की समस्याएं सुन रहे हैं, लेकिन स्वयं मुख्यमंत्री कार्यालय आम नागरिकों और सामाजिक प्रतिनिधियों के लिए लगभग बंद दरवाजे जैसा प्रतीत हो रहा है। राजनीतिक और पत्रकारिता जगत में अब यह सवाल खुलकर उठने लगा है कि जब जिले का कलेक्टर जनता से मिल सकता है, तो प्रदेश का मुख्यमंत्री जनता से सीधा संवाद करने से क्यों बच रहा है?सबसे गंभीर और शर्मनाक पहलू यह बताया जा रहा है कि एक वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार एवं विभिन्न सामाजिक संगठनों के पदाधिकारी द्वारा कई बार मुख्यमंत्री से मिलने के लिए विधिवत आवेदन दिए गए। मुख्यमंत्री सचिव पी. दयानंद और प्रमुख सचिव सुबोध कुमार सिंह को पत्र सौंपे गए, मुख्यमंत्री कार्यालय की आधिकारिक ईमेल आईडी पर आवेदन भेजे गए, यहां तक कि जारी टेलीफोन नंबरों पर भी समय मांगने के लिए लगातार संपर्क किया गया, लेकिन आज तक मुलाकात के लिए समय नहीं मिल पाया।यह केवल एक व्यक्ति की शिकायत नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे सत्ता और जनता के बीच बढ़ती दूरी का प्रतीक माना जा रहा है। लोकतंत्र में मुख्यमंत्री केवल प्रशासनिक प्रमुख नहीं होता, बल्कि वह जनता की उम्मीदों और समस्याओं का सबसे बड़ा संवैधानिक प्रतिनिधि भी होता है। ऐसे में यदि पत्रकार, साहित्यकार, सामाजिक कार्यकर्ता और आम नागरिक मुख्यमंत्री तक अपनी बात ही न पहुंचा सकें, तो “सुशासन” और “जनसेवा” के दावे खोखले नजर आने लगते हैं।राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि जनदर्शन केवल औपचारिक कार्यक्रम नहीं होता, बल्कि यह सरकार की संवेदनशीलता और जवाबदेही का प्रतीक होता है। पूर्ववर्ती सरकारों में कई शिकायतें सीधे मुख्यमंत्री स्तर पर सुनी जाती थीं, जिससे जनता में विश्वास पैदा होता था कि सत्ता उनके दरवाजे तक पहुंच रही है। लेकिन वर्तमान व्यवस्था में मुख्यमंत्री कार्यालय तक पहुंचना आम व्यक्ति के लिए लगभग असंभव जैसा अनुभव बनता जा रहा है।अब बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या मुख्यमंत्री विष्णु देव साय जनता से सीधे संवाद से दूरी बनाकर केवल प्रशासनिक फाइलों और मंचीय आयोजनों तक सीमित होते जा रहे हैं? यदि ऐसा है, तो आने वाले समय में यह दूरी राजनीतिक रूप से भी भारी पड़ सकती है। क्योंकि लोकतंत्र में जनता से संवाद बंद होते ही सत्ता के प्रति असंतोष तेज़ी से बढ़ने लगता है।