तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ अपनी समृद्ध लोकसंस्कृति, धार्मिक परंपराओं, लोककलाओं, पुरातात्विक विरासत और आदिवासी जीवन शैली के लिए देशभर में अलग पहचान रखता है। बदलते समय और आधुनिकता की दौड़ में जहां कई पारंपरिक कलाएं, लोकगीत, रीति-रिवाज और ऐतिहासिक धरोहरें धीरे-धीरे विलुप्ति की कगार पर पहुंच रही हैं, वहीं अब इन्हें सहेजने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने की दिशा में संस्कृति, धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व विभाग में नई सक्रियता दिखाई देने लगी है। विभाग के नव पदस्थ संचालक डॉ. संजय कन्नोजे के कार्यभार संभालने के बाद विभागीय स्तर पर सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण को लेकर गंभीर पहल शुरू होने की चर्चा तेज हो गई है।सूत्रों के अनुसार डॉ. संजय कन्नोजे प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान को केवल सरकारी आयोजनों तक सीमित नहीं रखना चाहते, बल्कि गांव-गांव में बिखरी लोककलाओं, लोक कलाकारों, प्राचीन मंदिरों, धार्मिक स्थलों, मेलों, पारंपरिक वाद्य यंत्रों और लोक साहित्य को व्यवस्थित रूप से संरक्षित करने की दिशा में कार्ययोजना तैयार कर रहे हैं। विभागीय स्तर पर ऐसे कलाकारों और परंपराओं का दस्तावेजीकरण किए जाने की भी चर्चा है, जो वर्षों से उपेक्षा का शिकार रहे हैं।छत्तीसगढ़ में पंथी, राऊत नाचा, करमा, सुवा, ददरिया, चंदैनी, भरथरी जैसी लोक परंपराएं केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं बल्कि प्रदेश की आत्मा मानी जाती हैं। लेकिन बीते वर्षों में कलाकारों की आर्थिक स्थिति, सरकारी उपेक्षा और मंचों की कमी के कारण कई विधाएं कमजोर होती चली गईं। ऐसे समय में संस्कृति विभाग से उम्मीद की जा रही है कि वह केवल उत्सवधर्मिता से आगे बढ़कर स्थायी संरक्षण की नीति पर काम करेगा। माना जा रहा है कि डॉ. कन्नोजे इस दिशा में गंभीरता से पहल कर सकते हैं।धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व विभाग की जिम्मेदारी भी अपने आप में बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। प्रदेश के कई ऐतिहासिक मंदिर, मठ और धार्मिक स्थल वर्षों से मूलभूत सुविधाओं और संरक्षण की प्रतीक्षा में हैं। कई स्थानों पर अव्यवस्था, अतिक्रमण और रखरखाव की कमी लगातार सवालों के घेरे में रही है। ऐसे में विभागीय नेतृत्व के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल योजनाएं बनाना नहीं बल्कि उन्हें जमीन पर उतारना भी होगा।सांस्कृतिक जानकारों का मानना है कि यदि विभाग वास्तव में गंभीरता से कार्य करे तो छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान बना सकती है। पर्यटन, रोजगार और सांस्कृतिक शोध के क्षेत्र में भी इससे बड़े अवसर पैदा हो सकते हैं। जरूरत केवल इस बात की है कि योजनाएं फाइलों से निकलकर गांवों और कलाकारों तक पहुंचें।फिलहाल संस्कृति विभाग में नई सोच और नई कार्यशैली की उम्मीद दिखाई दे रही है। अब देखने वाली बात यह होगी कि डॉ. संजय कन्नोजे की अगुवाई में विभाग छत्तीसगढ़ की विरासत को केवल भाषणों और आयोजनों तक सीमित रखता है या वास्तव में आने वाली पीढ़ियों के लिए इसे सुरक्षित रखने में सफल हो पाता है।