डीएफओ लड़ रही घोटालेबाजों से, बदनाम करने बन रही रणनीति।

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तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ के प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी के गृह जिला गौरेला-पेंड्रा- मरवाही के मरवाही वन मंडल में इन दिनों भ्रष्टाचार और अवैध गतिविधियों पर कार्रवाई को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। वन विभाग के सूत्रों और स्थानीय चर्चाओं के अनुसार मरवाही वन मंडल में पदस्थ आईएफएस अधिकारी ग्रीष्मी चांद द्वारा विभागीय अनियमितताओं, भ्रष्टाचार और संदिग्ध कार्यप्रणाली पर सख्ती दिखाए जाने के बाद कुछ वन कर्मियों, ठेकेदारों और कथित हितग्राहियों का गठजोड़ सक्रिय हो गया है।चर्चा यह है कि लंबे समय से वन विभाग में जमे कुछ तत्वों के आर्थिक हित प्रभावित होने लगे हैं। विभागीय कार्यों में पारदर्शिता, फाइलों की जांच, निर्माण कार्यों और भुगतान प्रक्रियाओं पर निगरानी बढ़ने से कथित तौर पर कई लोगों की “सेटिंग व्यवस्था” बिगड़ गई है। यही वजह बताई जा रही है कि अब सोशल मीडिया, अंदरूनी शिकायतों और अफवाहों के जरिए अधिकारी की छवि धूमिल करने की कोशिशें तेज हो गई हैं।वन विभाग के जानकारों का कहना है कि जब भी कोई अधिकारी सिस्टम में पारदर्शिता लाने की कोशिश करता है, तब सबसे पहले उसके खिलाफ ही माहौल बनाया जाता है। मरवाही वन मंडल में भी कुछ ऐसा ही परिदृश्य देखने को मिल रहा है। सूत्रों के अनुसार विभाग के भीतर से ही कुछ लोग ठेकेदारों के साथ मिलकर नकारात्मक प्रचार कर रहे हैं ताकि कार्रवाई का दबाव कम किया जा सके और पुरानी कार्यशैली दोबारा बहाल हो सके।स्थानीय स्तर पर यह सवाल भी उठने लगा है कि यदि कोई अधिकारी भ्रष्टाचार और अनियमितताओं पर रोक लगाने का प्रयास करता है, तो क्या उसे इसी तरह बदनाम करने का प्रयास किया जाएगा? चर्चा इस बात की भी है कि वन विभाग में वर्षों से सक्रिय नेटवर्क ईमानदार और सख्त अफसरों को मानसिक दबाव में लाकर कमजोर करने की रणनीति अपनाता रहा है।हालांकि इन आरोपों और चर्चाओं की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन विभागीय गलियारों में चल रही हलचल ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मरवाही वन मंडल में सब कुछ सामान्य नहीं है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि शासन और वरिष्ठ अधिकारी इस पूरे मामले को किस गंभीरता से लेते हैं और क्या भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई करने वाले अधिकारियों को संस्थागत संरक्षण मिल पाएगा या नहीं।


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