तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
वन विभाग से जुड़ा एक गंभीर मामला इन दिनों चर्चाओं में है, जहां विभाग के एक कर्मचारी की कथित अवैध संपत्ति और संदिग्ध आर्थिक गतिविधियों को लेकर कई सवाल खड़े हो रहे हैं। चर्चा है कि कभी दूध बेचकर जीवनयापन करने वाला यह कर्मचारी वन विभाग में नौकरी मिलने के बाद अचानक करोड़ों की संपत्ति का मालिक बन बैठा। क्षेत्र में यह मामला अब केवल व्यक्तिगत संपत्ति तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि पूरे विभागीय सिस्टम की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं।सूत्रों के अनुसार एक वन मंडलाधिकारी की कथित अवैध कमाई को एसीबी की संभावित कार्रवाई से बचाने के नाम पर जंगलों और सुरक्षित स्थानों में छुपाने की जिम्मेदारी इसी कर्मचारी को दी गई थी। लेकिन आरोप यह है कि उसने उस काली कमाई के बड़े हिस्से को स्वयं ही हड़प लिया और धीरे-धीरे जमीन, मकान और अन्य संपत्तियों का साम्राज्य खड़ा कर लिया। इलाके में इस कर्मचारी की आर्थिक स्थिति में अचानक आए बदलाव को लेकर लंबे समय से चर्चाएं होती रही हैं, लेकिन विभागीय स्तर पर कभी गंभीर जांच नहीं हुई।वन विभाग के भीतर भी इस पूरे घटनाक्रम को लेकर कानाफूसी तेज है। कर्मचारी की जीवनशैली, आलीशान संपत्तियां और बढ़ती आर्थिक ताकत अब विभाग के अन्य कर्मचारियों के बीच भी चर्चा का विषय बनी हुई है। सवाल यह उठ रहा है कि आखिर एक सामान्य कर्मचारी इतनी बड़ी संपत्ति कैसे अर्जित कर सकता है? यदि यह संपत्ति वैध है तो उसके आय के स्रोत सार्वजनिक क्यों नहीं किए जा रहे?सबसे बड़ा सवाल विभागीय अधिकारियों की भूमिका को लेकर उठ रहा है। यदि इतने वर्षों से अवैध कमाई और संपत्ति का खेल चलता रहा तो क्या उच्च अधिकारी इससे अनजान थे? या फिर पूरे सिस्टम की मौन सहमति से यह सब होता रहा? वन विभाग जैसे संवेदनशील विभाग में यदि भ्रष्टाचार की जड़ें इस हद तक फैल चुकी हैं तो यह शासन की पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है।क्षेत्र के लोगों का कहना है कि जंगलों की सुरक्षा और वन संपदा बचाने की जिम्मेदारी जिन लोगों पर है, यदि वही भ्रष्टाचार और अवैध कमाई के जाल में उलझ जाएं तो आम जनता का विश्वास टूटना स्वाभाविक है। अब मांग उठ रही है कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो, कर्मचारी और संबंधित अधिकारियों की संपत्तियों की जांच एजेंसियों से पड़ताल कराई जाए तथा यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो कठोर कार्रवाई की जाए।वन विभाग