लिव-इन रिलेशनशिप, 9 साल का साथ और फिर दुष्कर्म का मामला: कानून, समाज और न्याय व्यवस्था पर उठते सवाल।

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तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

बिलासपुर संभाग अंतर्गत रायगढ़ जिले के तमनार थाना क्षेत्र में सामने आए एक मामले ने एक बार फिर लिव-इन रिलेशनशिप, शादी के वादे और दुष्कर्म संबंधी कानूनों को लेकर गंभीर बहस छेड़ दी है। पुलिस ने एक युवती की शिकायत पर 31 वर्षीय युवक को गिरफ्तार कर न्यायिक रिमांड पर भेज दिया है। आरोप है कि युवक ने शादी का झांसा देकर वर्ष 2017 से लगातार शारीरिक संबंध बनाए और बाद में शादी से इनकार कर दिया।मामले के अनुसार, युवती और आरोपी लगभग नौ वर्षों तक एक-दूसरे के संपर्क में रहे। शिकायत में कहा गया है कि प्रेम संबंध स्थापित होने के बाद आरोपी ने विवाह का आश्वासन दिया और इसी आधार पर शारीरिक संबंध बनाए। जब युवती ने विवाह के लिए दबाव बनाया तो आरोपी ने साथ रखने और शादी करने से इनकार कर दिया, जिसके बाद थाना तमनार में प्राथमिकी दर्ज कराई गई।पुलिस ने शिकायत को गंभीरता से लेते हुए भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 69 के तहत अपराध दर्ज किया और आरोपी को गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे न्यायिक रिमांड पर भेज दिया गया।हालांकि यह मामला केवल एक आपराधिक प्रकरण नहीं, बल्कि कई कानूनी और सामाजिक सवाल भी खड़े करता है। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि दो वयस्क व्यक्ति वर्षों तक सहमति से संबंध में रहे और लिव-इन जैसी स्थिति में साथ रहे, तो नौ वर्ष बाद दर्ज हुई शिकायत को किस दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए? दूसरी ओर, यदि शुरुआत से ही विवाह का वादा केवल छल का माध्यम था, तो यह कानूनन गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है।कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में न्यायालय यह जांच करता है कि विवाह का वादा वास्तविक था या केवल शारीरिक संबंध स्थापित करने के उद्देश्य से किया गया था। यदि यह साबित हो जाए कि आरोपी की शुरुआत से ही शादी करने की कोई मंशा नहीं थी, तो मामला दुष्कर्म की श्रेणी में माना जा सकता है। वहीं यदि दोनों पक्षों के बीच लंबे समय तक स्वेच्छा से संबंध रहे और बाद में परिस्थितियां बदलीं, तो तथ्य और साक्ष्य निर्णायक भूमिका निभाते हैं।यह मामला महिलाओं की सुरक्षा और अधिकारों से जुड़ा है, लेकिन साथ ही यह भी दर्शाता है कि लिव-इन रिलेशनशिप और विवाह संबंधी विवादों में स्पष्ट कानूनी समझ और समय पर निर्णय कितना आवश्यक है। समाज में तेजी से बदलते संबंधों के बीच ऐसे प्रकरण न्यायपालिका, पुलिस और विधि विशेषज्ञों के लिए भी चुनौती बनते जा रहे हैं।फिलहाल आरोपी गिरफ्तार हो चुका है और मामला न्यायालय के विचाराधीन है। अंतिम सत्य और दोष-निर्दोष का निर्धारण न्यायिक प्रक्रिया और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही होगा। ऐसे मामलों में किसी भी पक्ष को दोषी या निर्दोष मानने से पहले अदालत के अंतिम निर्णय की प्रतीक्षा करना ही न्यायसंगत दृष्टिकोण माना जाता है।


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