गोबर खरीदी घोटाले में कार्रवाई पर उठे पक्षपात के आरोप, जांच की निष्पक्षता पर सवाल।

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तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

बिलासपुर संभाग अंर्तगत गौरेला-पेण्ड्रा-मरवाही जिले के मरवाही वनमंडल में करोड़ों रुपये के गोबर खरीदी घोटाले को लेकर की गई विभागीय कार्रवाई अब नए विवादों में घिरती नजर आ रही है। मामले में केवल एक अधिकारी पर कार्रवाई किए जाने को लेकर कर्मचारियों और स्थानीय लोगों के बीच सवाल उठने लगे हैं। आरोप लगाया जा रहा है कि पूरे प्रकरण में संगठित रूप से हुए कथित भ्रष्टाचार के बावजूद जांच को एकतरफा दिशा देकर कुछ प्रभावशाली अधिकारियों और कर्मचारियों को बचाने का प्रयास किया गया है।विभागीय सूत्रों के अनुसार गोबर खरीदी एवं भुगतान से जुड़े इस मामले में वन विभाग के तत्कालीन सखा प्रभारी भूपेंद्र साहू के खिलाफ कार्रवाई की गई है, लेकिन आरोप है कि इस पूरे वित्तीय लेन-देन में कई अन्य अधिकारी और कर्मचारी भी समान रूप से जिम्मेदार थे। इसके बावजूद उनके खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई, जिससे जांच की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगने लगे हैं।विभागीय सूत्रों का कहना है कि उस समय मरवाही वनमंडल में पदस्थ रहे तत्कालीन डीएफओ रौनक गोयल (आईएफएस), मुख्य लिपिक शैल गुप्ता, वन प्रबंधन समिति के तत्कालीन सचिव श्रीकांत परिहार, वन चौकीदार सुरेश राठौर तथा संबंधित रेंज के अधिकारियों की भूमिका की भी गंभीर जांच होनी चाहिए थी। आरोप है कि गोबर खरीदी, भुगतान और आहरण से जुड़े दस्तावेजों में मुख्य लिपिक स्तर पर नोटशीट और अनुमोदन की प्रक्रिया पूरी की गई थी। ऐसे में केवल एक अधिकारी को जिम्मेदार ठहराना न्यायसंगत नहीं माना जा रहा है।मामले से जुड़े लोगों का कहना है कि यदि वित्तीय अनियमितताएं हुई हैं तो उनकी जवाबदेही केवल एक कर्मचारी तक सीमित नहीं हो सकती। विभागीय नियमों के अनुसार भुगतान और आहरण की प्रत्येक प्रक्रिया कई स्तरों से होकर गुजरती है, जिसमें प्रशासनिक और वित्तीय स्वीकृतियां भी शामिल होती हैं। ऐसे में जांच एजेंसी को सभी संबंधित अधिकारियों की भूमिका का निष्पक्ष मूल्यांकन करना चाहिए।स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा है कि यदि पूरे प्रकरण की गहराई से जांच की जाए तो कई और चौंकाने वाले तथ्य सामने आ सकते हैं। आरोप लगाने वालों का कहना है कि जांच रिपोर्ट में कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों और दस्तावेजों को नजरअंदाज किया गया है, जिसके कारण वास्तविक जिम्मेदार व्यक्तियों तक कार्रवाई नहीं पहुंच पाई।अब विभिन्न कर्मचारी संगठनों और सामाजिक प्रतिनिधियों द्वारा मांग उठाई जा रही है कि इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय एवं स्वतंत्र जांच कराई जाए तथा तत्कालीन डीएफओ रौनक गोयल, मुख्य लिपिक शैल गुप्ता, वन प्रबंधन समिति के तत्कालीन सचिव श्रीकांत परिहार, वन चौकीदार सुरेश राठौर तथा अन्य संबंधित अधिकारियों-कर्मचारियों की भूमिका की भी निष्पक्ष जांच की जाए। मांग यह भी की जा रही है कि जांच पूरी होने तक संबंधित अधिकारियों को निलंबित कर विभागीय कार्रवाई प्रारंभ की जाए।मामले ने अब वन विभाग में नई बहस को जन्म दे दिया है। सवाल यह उठ रहा है कि यदि घोटाला सामूहिक जिम्मेदारी का परिणाम था, तो कार्रवाई केवल एक व्यक्ति तक क्यों सीमित रखी गई? वहीं विभाग की ओर से अभी तक इस संबंध में कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है।फिलहाल मरवाही वनमंडल का यह मामला विभागीय पारदर्शिता, जवाबदेही और निष्पक्ष जांच को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। यदि आरोपों में दम है तो आने वाले दिनों में यह प्रकरण और अधिक तूल पकड़ सकता है।


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