करोड़ों के वृक्षारोपण पर सवाल: पौधे लगते हैं, पर बचते कितने हैं?

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तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ में पर्यावरण संरक्षण और हरित क्षेत्र बढ़ाने के उद्देश्य से हर वर्ष करोड़ों रुपये खर्च कर बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण किया जाता है। वन विभाग, पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग, नगरीय निकायों, शैक्षणिक संस्थानों तथा विभिन्न सरकारी योजनाओं के माध्यम से लाखों पौधे लगाए जाने के दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर इन पौधों की देखरेख और संरक्षण को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं।राज्य के अनेक जिलों में वृक्षारोपण अभियान के दौरान लगाए गए पौधे कुछ ही महीनों में पानी, सुरक्षा और नियमित निगरानी के अभाव में सूख जाते हैं। कई स्थानों पर पौधों के चारों ओर सुरक्षा जाली तक नहीं लगाई जाती, जिससे पशुओं द्वारा उन्हें नुकसान पहुंचता है। वहीं कहीं-कहीं पौधारोपण के बाद विभागीय अधिकारियों द्वारा दोबारा स्थल निरीक्षण तक नहीं किया जाता।पर्यावरणविदों का कहना है कि वृक्षारोपण केवल पौधे लगाने तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उनकी कम से कम तीन से पांच वर्षों तक नियमित देखरेख सुनिश्चित की जानी चाहिए। यदि पौधों के जीवित रहने की दर कम है तो करोड़ों रुपये खर्च करने का उद्देश्य भी अधूरा रह जाता है। उनका मानना है कि पौधारोपण की सफलता का आकलन लगाए गए पौधों की संख्या से नहीं, बल्कि जीवित बचे वृक्षों की संख्या से किया जाना चाहिए।ग्रामीण क्षेत्रों में भी स्थिति चिंताजनक बताई जा रही है। कई ग्राम पंचायतों में मनरेगा और अन्य योजनाओं के तहत पौधारोपण तो किया गया, लेकिन सिंचाई और संरक्षण की व्यवस्था नहीं होने से अधिकांश पौधे नष्ट हो गए। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि ग्राम स्तर पर जनभागीदारी और जिम्मेदारी तय की जाए तो वृक्षारोपण के बेहतर परिणाम सामने आ सकते हैं।विशेषज्ञों का सुझाव है कि प्रत्येक वृक्षारोपण स्थल का जीआईएस मैपिंग, नियमित सोशल ऑडिट और जीवित पौधों की स्वतंत्र जांच कराई जानी चाहिए। साथ ही, पौधों की उत्तरजीविता (सर्वाइवल रेट) को अधिकारियों और संबंधित एजेंसियों के प्रदर्शन से जोड़ा जाना चाहिए।पर्यावरण संरक्षण आज केवल सरकारी अभियान नहीं, बल्कि भविष्य की आवश्यकता है। ऐसे में यह आवश्यक हो गया है कि वृक्षारोपण को केवल आंकड़ों और रिकॉर्ड तक सीमित न रखकर पौधों को वृक्ष बनने तक संरक्षण और देखभाल की प्रभावी व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। अन्यथा हर वर्ष करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद हरियाली बढ़ाने का लक्ष्य अधूरा ही रह जाएगा।


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