विश्व पर्यावरण दिवस विशेष: प्लास्टिक का बढ़ता जाल, धरती की सेहत पर गहराता संकट; कहीं बंजर न हो जाए कृषि भूमि।

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विकास नंद/सर्वव्यापी

आधुनिक जीवनशैली की सुविधा ने प्लास्टिक को हमारी रोजमर्रा की जरूरतों का अभिन्न हिस्सा बना दिया है, लेकिन यही प्लास्टिक अब पर्यावरण और कृषि भूमि के लिए गंभीर खतरे का रूप लेता जा रहा है। गांवों से लेकर शहरों तक प्लास्टिक का बढ़ता उपयोग और उसके बाद होने वाला लापरवाह निपटान धरती की सेहत पर भारी पड़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते इस समस्या पर प्रभावी नियंत्रण नहीं किया गया, तो भविष्य में कृषि भूमि की उर्वरता प्रभावित होने के साथ-साथ जल, जंगल और जैव विविधता को भी भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।किराना दुकानों से लेकर बड़े बाजारों तक अधिकांश वस्तुएं प्लास्टिक पैकिंग में उपलब्ध हैं। उपयोग के बाद पॉलीथिन, प्लास्टिक बोतलें, खाद्य सामग्री के रैपर और अन्य अपशिष्ट खुले में फेंक दिए जाते हैं। यही कचरा धीरे-धीरे खेतों, नालों, तालाबों और जंगलों तक पहुंचकर पर्यावरण प्रदूषण का कारण बनता है।विशेषज्ञ बताते हैं कि प्लास्टिक एक ऐसा पदार्थ है जो सैकड़ों वर्षों तक पूरी तरह नष्ट नहीं होता। खेतों में जमा प्लास्टिक मिट्टी की संरचना को प्रभावित करता है और पानी के प्राकृतिक प्रवाह को बाधित करता है। इससे मिट्टी की उर्वरा शक्ति घटने लगती है और फसलों की उत्पादकता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। लगातार बढ़ते प्लास्टिक कचरे के कारण आने वाले समय में कृषि भूमि के बंजर होने का खतरा भी बढ़ सकता है।पर्यावरणविदों के अनुसार प्लास्टिक कचरा वर्षा के पानी के साथ बहकर नालों और नदियों में पहुंचता है, जिससे जल स्रोत प्रदूषित होते हैं और जल निकासी व्यवस्था प्रभावित होती है। इसके अलावा पशु-पक्षियों के लिए भी यह गंभीर खतरा बन चुका है। अक्सर मवेशी भोजन समझकर प्लास्टिक निगल लेते हैं, जिससे उनकी तबीयत खराब होने के साथ कई बार मृत्यु तक हो जाती है। जंगलों में फैला प्लास्टिक वन्यजीवों के जीवन को भी प्रभावित कर रहा है।महासमुंद जिले में भी शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में प्लास्टिक कचरे की समस्या लगातार बढ़ रही है। प्रतिबंधित पॉलीथिन पर रोक के बावजूद कई स्थानों पर इसका उपयोग जारी है। जागरूकता की कमी और सुविधावादी सोच के कारण प्लास्टिक का उपयोग कम होने के बजाय बढ़ता जा रहा है, जिससे पर्यावरण संरक्षण की चुनौती और गंभीर होती जा रही है।सामाजिक संगठनों और पर्यावरण प्रेमियों ने शासन-प्रशासन से प्लास्टिक उपयोग पर सख्ती से नियंत्रण करने, प्रतिबंधित पॉलीथिन के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई चलाने तथा वैकल्पिक साधनों को बढ़ावा देने की मांग की है। साथ ही आम लोगों से कपड़े और जूट के थैलों का उपयोग अपनाने, प्लास्टिक कचरे का उचित निपटान करने तथा पर्यावरण संरक्षण में सक्रिय भागीदारी निभाने की अपील की जा रही है।

विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर यह संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारी जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है। यदि आज प्लास्टिक के उपयोग को सीमित करने और स्वच्छता के प्रति जागरूकता बढ़ाने के ठोस प्रयास किए जाएं, तभी आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ, सुरक्षित और हरित पर्यावरण सौंपा जा सकेगा।


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