जंगल से बस्तियों तक: आखिर क्यों बढ़ रहा है मानव-वन्यजीव संघर्ष? छत्तीसगढ़ में भालू और हाथियों का रिहायशी इलाकों में लगातार बढ़ता प्रवेश, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल।

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तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ के विभिन्न जिलों में इन दिनों जंगलों से निकलकर भालुओं और हाथियों के गांवों तथा शहरी रिहायशी क्षेत्रों तक पहुंचने की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। सरगुजा, जशपुर, कोरबा, सूरजपुर, रायगढ़, गरियाबंद, गौरेला पेंड्रा मरवाही, महासमुंद, धमतरी और बिलासपुर संभाग के कई क्षेत्रों में हाथियों के दल खेतों, घरों और सार्वजनिक परिसरों तक पहुंच रहे हैं, जबकि भालुओं की मौजूदगी भी आबादी वाले इलाकों में चिंता का विषय बनती जा रही है। इन घटनाओं ने वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग की कार्यप्रणाली और दीर्घकालिक वन्यजीव प्रबंधन नीति पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं।विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी वन्यजीव का अपने प्राकृतिक आवास को छोड़कर मानव बस्तियों की ओर आना सामान्य स्थिति नहीं माना जा सकता। यह स्थिति जंगलों में भोजन, पानी और सुरक्षित आवास की उपलब्धता में कमी का संकेत देती है। इसके बावजूद विभाग की ओर से वर्षों से करोड़ों रुपये खर्च किए जाने के दावों के बीच मानव-वन्यजीव संघर्ष लगातार बढ़ता जा रहा है।ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों का आरोप है कि वन विभाग केवल घटना घटने के बाद सक्रिय होता है। हाथियों के हमले में जनहानि हो या भालुओं के हमले में लोगों के घायल होने की घटनाएं, विभागीय अमला अधिकांश मामलों में राहत और मुआवजा प्रक्रिया तक ही सीमित दिखाई देता है। वन्यजीवों को जंगलों में रोकने तथा उनके प्राकृतिक आवास को सुरक्षित और समृद्ध बनाने की दिशा में अपेक्षित परिणाम दिखाई नहीं दे रहे हैं।सवाल यह भी उठ रहा है कि यदि जंगलों में पर्याप्त जल स्रोत, चारागाह और खाद्य संसाधन विकसित किए गए हैं, तो फिर हाथियों और भालुओं को गांवों और शहरों की ओर आने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है? कई क्षेत्रों में ग्रामीणों का आरोप है कि वन क्षेत्र में खनन, सड़क निर्माण, अतिक्रमण और मानव गतिविधियों के विस्तार ने वन्यजीवों के पारंपरिक मार्गों को प्रभावित किया है, लेकिन इन समस्याओं के समाधान के लिए ठोस पहल नहीं दिखाई देती।वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि हाथियों के कॉरिडोर और भालुओं के प्राकृतिक आवासों के संरक्षण पर जितना ध्यान दिया जाना चाहिए था, उतना नहीं दिया गया। परिणामस्वरूप वन्यजीवों और मनुष्यों के बीच दूरी लगातार कम होती जा रही है। इसका खामियाजा ग्रामीणों को अपनी जान-माल की हानि के रूप में भुगतना पड़ रहा है।विपक्षी दलों और सामाजिक संगठनों ने भी इस मुद्दे को गंभीर बताते हुए वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग से जवाब मांगा है। उनका कहना है कि यदि विभाग समय रहते प्रभावी रणनीति बनाता, जंगलों में जल और भोजन की पर्याप्त व्यवस्था सुनिश्चित करता तथा वन्यजीव कॉरिडोरों का संरक्षण करता, तो आज यह स्थिति उत्पन्न नहीं होती।सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर वन्यजीव अपने सुरक्षित प्राकृतिक आवास को छोड़कर मानव बस्तियों की ओर क्यों बढ़ रहे हैं? क्या यह जंगलों के सिकुड़ने का परिणाम है, विभागीय योजनाओं की विफलता है या फिर वन प्रबंधन में दीर्घकालिक दृष्टिकोण की कमी? इन सवालों के जवाब तलाशना अब केवल प्रशासनिक आवश्यकता नहीं, बल्कि जनसुरक्षा और वन्यजीव संरक्षण दोनों के लिए अनिवार्य हो गया है।छत्तीसगढ़ में बढ़ता मानव-वन्यजीव संघर्ष केवल वन विभाग की चुनौती नहीं, बल्कि वन प्रबंधन की वास्तविक स्थिति का आईना बन चुका है। जब तक जंगलों को वन्यजीवों के लिए पर्याप्त सुरक्षित, समृद्ध और संसाधनयुक्त नहीं बनाया जाएगा, तब तक भालू और हाथियों का बस्तियों की ओर आना तथा मानव जीवन पर खतरा बने रहना एक गंभीर चिंता का विषय बना रहेगा।


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