मुख्यमंत्री की चिट्ठी बेअसर, शिक्षकों में शिक्षा विभाग के खिलाफ पनप रहा आक्रोश।

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तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

रछत्तीसगढ़ में नए शिक्षा सत्र की शुरुआत हो चुकी है। स्कूलों में विद्यार्थियों की पढ़ाई शुरू हो गई है, लेकिन दूसरी ओर हजारों की संख्या में ऐसे व्याख्याता और शिक्षक हैं जो वर्षों से स्थानांतरण और प्रतिनियुक्ति की मांग को लेकर शासन-प्रशासन के चक्कर काट रहे हैं। सबसे गंभीर बात यह है कि मुख्यमंत्री सचिवालय से जारी नियमित पत्राचार और निर्देशों के बावजूद शिक्षा विभाग में उनकी समस्याओं के निराकरण की दिशा में कोई ठोस पहल दिखाई नहीं दे रही है। विभागीय स्तर पर लंबित फाइलों और पत्रों पर धूल जमने लगी है, जिससे प्रभावित शिक्षकों में गहरा आक्रोश व्याप्त है।शिक्षकों का कहना है कि पारिवारिक, स्वास्थ्यगत एवं सामाजिक कारणों से उन्होंने स्थानांतरण अथवा प्रतिनियुक्ति के लिए आवेदन प्रस्तुत किए थे। कई मामलों में जनदर्शन, मुख्यमंत्री कार्यालय और जनप्रतिनिधियों के माध्यम से भी प्रकरण भेजे गए, लेकिन आज तक कोई निर्णय नहीं लिया गया। परिणामस्वरूप अनेक शिक्षक अपने परिवार से दूर रहकर नौकरी करने को मजबूर हैं, जिसका प्रतिकूल प्रभाव उनके मानसिक स्वास्थ्य और कार्यक्षमता पर भी पड़ रहा है।शिक्षक संगठनों का आरोप है कि सरकार एक ओर शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने और सुशासन की बात करती है, वहीं दूसरी ओर शिक्षकों की वास्तविक समस्याओं के समाधान के प्रति गंभीरता नहीं दिखा रही है। मुख्यमंत्री सचिवालय से प्राप्त पत्रों पर यदि समयबद्ध कार्रवाई नहीं हो रही है तो यह प्रशासनिक जवाबदेही पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। शिक्षकों का मानना है कि यदि शासन के सर्वोच्च स्तर से भेजे गए निर्देश भी विभागीय उदासीनता की भेंट चढ़ रहे हैं, तो आम कर्मचारियों की समस्याओं के समाधान की स्थिति का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है।प्रदेशभर के प्रभावित व्याख्याताओं और शिक्षकों में अब असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। कई संगठन आंदोलन की रणनीति बनाने में जुट गए हैं। उनका कहना है कि यदि शीघ्र ही स्थानांतरण और प्रतिनियुक्ति संबंधी मामलों का निराकरण नहीं किया गया तो प्रदेशव्यापी आंदोलन, धरना-प्रदर्शन और लोकतांत्रिक विरोध के अन्य माध्यम अपनाए जाएंगे।शिक्षा जगत से जुड़े जानकारों का भी मानना है कि शिक्षक केवल कर्मचारी नहीं बल्कि शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ होते हैं। उनकी समस्याओं की लगातार अनदेखी से न केवल उनका मनोबल प्रभावित होता है, बल्कि इसका असर विद्यार्थियों और शैक्षणिक वातावरण पर भी पड़ता है। ऐसे में सरकार और शिक्षा विभाग को संवेदनशीलता दिखाते हुए लंबित प्रकरणों का त्वरित निराकरण करना चाहिए, ताकि नए शिक्षा सत्र की शुरुआत शिक्षकों की नाराजगी और प्रशासनिक उदासीनता के बीच नहीं, बल्कि सकारात्मक वातावरण में हो सके।


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