साइकिल पर दिखावा, काफिलों में खर्चा: क्या ईंधन बचत सिर्फ फोटो-ऑप तक सीमित?

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तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा समय-समय पर ईंधन संरक्षण, पर्यावरण सुरक्षा और संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग को लेकर देशवासियों से अपील की जाती रही है। हाल ही में भी ईंधन बचत और प्रदूषण नियंत्रण के संदेश को जन-जन तक पहुंचाने के लिए भाजपा नेताओं, मंत्रियों और जनप्रतिनिधियों ने साइकिल चलाकर तथा कुछ समय के लिए सरकारी वाहनों के उपयोग को कम कर एक प्रतीकात्मक अभियान चलाया था। उस दौरान सोशल मीडिया से लेकर समाचार माध्यमों तक साइकिल यात्रा और ईंधन बचत के संदेशों की व्यापक चर्चा हुई थी। लेकिन कुछ ही दिनों बाद प्रदेश और देश में सत्ता से जुड़े अनेक नेताओं और मंत्रियों के काफिलों में फिर से दर्जनों वाहनों की लंबी कतारें दिखाई देने लगी हैं, जिससे आम जनता के बीच कई सवाल उठने लगे हैं।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि ईंधन बचत वास्तव में सरकार और सत्ताधारी दल की प्राथमिकता है तो इसका पालन केवल एक दिन या विशेष अवसरों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। जनता यह जानना चाहती है कि जब आम नागरिकों से पेट्रोल-डीजल की बचत करने, सार्वजनिक परिवहन अपनाने और अनावश्यक वाहन उपयोग से बचने की अपील की जाती है, तब सत्ता के शीर्ष पदों पर बैठे लोग स्वयं इस दिशा में कितना अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं।विपक्षी दलों का आरोप है कि भाजपा नेताओं द्वारा साइकिल चलाने और ईंधन बचत के कार्यक्रम महज प्रचारात्मक गतिविधियां बनकर रह गए हैं। उनका कहना है कि एक ओर जनता बढ़ती महंगाई और ईंधन की कीमतों का बोझ उठा रही है, वहीं दूसरी ओर वीआईपी संस्कृति और बड़े-बड़े काफिलों पर सरकारी संसाधनों का उपयोग लगातार जारी है। विपक्ष सवाल उठा रहा है कि यदि ईंधन बचत राष्ट्रीय दायित्व है तो इसकी शुरुआत सत्ता के गलियारों से क्यों नहीं होती।सामाजिक कार्यकर्ताओं का भी कहना है कि पर्यावरण संरक्षण और ऊर्जा बचत जैसे विषयों पर सरकार को प्रतीकात्मकता से आगे बढ़कर स्थायी नीति और व्यवहारिक उदाहरण प्रस्तुत करने होंगे। यदि मंत्री और वरिष्ठ अधिकारी आवश्यक सुरक्षा मानकों के भीतर रहते हुए अपने काफिलों का आकार सीमित करें, तो इससे न केवल ईंधन की बचत होगी बल्कि जनता के बीच एक सकारात्मक संदेश भी जाएगा।राजनीतिक दृष्टि से देखा जाए तो यह मुद्दा केवल ईंधन बचत तक सीमित नहीं है, बल्कि कथनी और करनी के अंतर से भी जुड़ा हुआ है। लोकतंत्र में जनता नेताओं के भाषणों से अधिक उनके व्यवहार को देखती है। ऐसे में जब एक दिन साइकिल चलाने वाले नेता अगले ही दिन दर्जनों वाहनों के काफिलों के साथ नजर आते हैं, तो स्वाभाविक रूप से जनता के मन में यह प्रश्न उठता है कि क्या ईंधन बचत का संदेश वास्तव में गंभीर था या फिर केवल कैमरों और सुर्खियों तक सीमित एक अभियान।आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकार और सत्ताधारी दल अपने ही संदेशों को व्यवहार में उतारकर दिखाएं। क्योंकि जनता अब केवल अपील नहीं, बल्कि नेतृत्व से उदाहरण भी चाहती है। ईंधन बचत का वास्तविक संदेश तब ही सार्थक माना जाएगा, जब सत्ता के शिखर पर बैठे लोग भी उसी अनुशासन और प्रतिबद्धता का पालन करते दिखाई देंगे, जिसकी अपेक्षा वे आम नागरिकों से करते हैं।


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