तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ अपनी समृद्ध लोकसंस्कृति, लोकगीतों और लोककलाओं के लिए पूरे देश में विशेष पहचान रखता है। यहां के लोकगीतों में खेत-खार, नदी-नाले, पर्व-त्योहार, प्रेम, भाईचारा और सामाजिक सरोकारों की झलक दिखाई देती है। लोकगायकों ने सदैव समाज को दिशा देने का कार्य किया है। किंतु हाल के वर्षों में कुछ छत्तीसगढ़िया गीतों में शराब का महिमामंडन जिस प्रकार बढ़ा है, वह चिंता का विषय बनता जा रहा है।आज कई गीतों में शराब को आनंद, मस्ती और आधुनिक जीवनशैली का प्रतीक बताकर प्रस्तुत किया जा रहा है। गीतों के बोल युवाओं को यह संदेश देते प्रतीत होते हैं कि शराब पीना एक सामान्य और आकर्षक व्यवहार है। सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफार्मों के माध्यम से ऐसे गीत तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं और लाखों युवाओं तक पहुंच रहे हैं। इसका सीधा प्रभाव समाज की नई पीढ़ी पर पड़ना स्वाभाविक है।यह प्रश्न केवल मनोरंजन का नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी का भी है। छत्तीसगढ़ में पहले से ही शराब की लत अनेक परिवारों के लिए आर्थिक और सामाजिक संकट का कारण बनी हुई है। घरेलू हिंसा, सड़क दुर्घटनाएं, अपराध और पारिवारिक विघटन जैसी समस्याओं में शराब की भूमिका किसी से छिपी नहीं है। ऐसे समय में यदि कलाकार और गायक शराब को गौरव और उत्सव के रूप में प्रस्तुत करेंगे, तो यह समाज सुधार के प्रयासों के विपरीत दिशा में कदम माना जाएगा।लोककलाकार केवल मनोरंजनकर्ता नहीं होते, वे समाज के सांस्कृतिक प्रतिनिधि भी होते हैं। उनकी लोकप्रियता और प्रभाव उन्हें एक विशेष जिम्मेदारी प्रदान करता है। जब कोई लोकगायक अपनी आवाज के माध्यम से सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ संदेश देता है, तो उसका प्रभाव व्यापक होता है। उसी प्रकार यदि वह शराब जैसी बुराई को आकर्षक रूप में प्रस्तुत करता है, तो उसका दुष्प्रभाव भी दूरगामी होता है।यह भी सच है कि कला और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र की आत्मा है। किसी कलाकार को अपनी रचनात्मकता व्यक्त करने का पूरा अधिकार है। लेकिन स्वतंत्रता के साथ सामाजिक उत्तरदायित्व भी जुड़ा होता है। ऐसी अभिव्यक्ति जो समाज में नकारात्मक प्रवृत्तियों को बढ़ावा दे, उस पर विमर्श और आत्मसंयम आवश्यक है।छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति की आत्मा गांव, खेत, श्रम, प्रकृति और मानवीय मूल्यों में बसती है, न कि नशे की संस्कृति में। हमारे लोकगीतों ने सदैव जीवन को जोड़ने, प्रेरित करने और सकारात्मक ऊर्जा देने का कार्य किया है। इसलिए समय की मांग है कि कलाकार, गायक, संगीतकार और निर्माता अपने सामाजिक दायित्व को समझें तथा ऐसे गीतों का निर्माण करें जो युवा पीढ़ी को सही दिशा दें।आज आवश्यकता किसी प्रतिबंध की नहीं, बल्कि सांस्कृतिक जागरूकता की है। यदि छत्तीसगढ़ के लोककलाकार अपनी प्रतिभा का उपयोग सामाजिक चेतना, शिक्षा, संस्कृति और विकास के संदेश प्रसारित करने में करें, तो वे केवल लोकप्रिय कलाकार ही नहीं, बल्कि समाज निर्माता भी कहलाएंगे।लोकगीतों की पहचान नशे के प्रचार से नहीं, बल्कि समाज को जागृत करने वाले संदेशों से होनी चाहिए। यही छत्तीसगढ़ की संस्कृति की वास्तविक गरिमा है और यही लोककला का सच्चा उद्देश्य भी।