तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
भारतीय समाज तेजी से बदल रहा है। पारंपरिक विवाह व्यवस्था के साथ-साथ लिव-इन रिलेशनशिप जैसी सामाजिक व्यवस्थाएं भी स्वीकार्यता प्राप्त कर रही हैं। ऐसे समय में महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान के लिए बनाए गए कानूनों का महत्व और भी बढ़ जाता है। दुष्कर्म, यौन शोषण और छेड़छाड़ जैसे अपराधों के विरुद्ध कठोर कानूनी प्रावधान इसलिए बनाए गए हैं ताकि वास्तविक पीड़िताओं को न्याय मिल सके और अपराधियों में कानून का भय बना रहे। लेकिन जब किसी कानून का दुरुपयोग होने लगे, तब उस पर गंभीर विमर्श भी उतना ही आवश्यक हो जाता है।पिछले कुछ वर्षों में देशभर के समाचार पत्रों और न्यायालयों में ऐसे अनेक मामले सामने आए हैं, जिनमें लंबे समय तक सहमति और पारस्परिक संबंधों में रहने के बाद महिला द्वारा पुरुष के खिलाफ “शादी का झांसा देकर दुष्कर्म” का मामला दर्ज कराया गया। कई मामलों में दोनों पक्ष वर्षों तक लिव-इन रिलेशनशिप में रहे, सामाजिक और निजी जीवन साझा किया, लेकिन संबंध टूटने के बाद मामला सीधे दुष्कर्म के आरोप तक पहुंच गया। इससे समाज में यह बहस तेज हुई है कि क्या हर असफल प्रेम संबंध या टूटे हुए रिश्ते को दुष्कर्म की श्रेणी में रखा जा सकता है?सर्वोच्च न्यायालय ने समय-समय पर अपने अनेक निर्णयों में स्पष्ट किया है कि यदि दो वयस्कों के बीच आपसी सहमति से शारीरिक संबंध स्थापित हुए हैं और शुरुआत से ही दोनों संबंध की प्रकृति को समझते थे, तो केवल संबंध टूट जाने या विवाह नहीं हो पाने के आधार पर उसे दुष्कर्म नहीं माना जा सकता। न्यायालय ने यह भी कहा है कि यदि विवाह का वादा शुरू से ही धोखाधड़ीपूर्ण और छलपूर्वक किया गया हो, तभी उसे आपराधिक दृष्टि से देखा जा सकता है। अर्थात प्रत्येक मामला अपने तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर तय होना चाहिए।यह भी उतना ही सत्य है कि समाज में आज भी अनेक महिलाएं वास्तविक यौन हिंसा, दैहिक शोषण और बलात्कार की शिकार होती हैं। उनके लिए न्याय प्राप्त करना आसान नहीं होता। उन्हें सामाजिक तिरस्कार, मानसिक आघात और लंबी कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। इसलिए किसी भी प्रकार की चर्चा में वास्तविक पीड़िताओं की पीड़ा को कम करके नहीं आंका जा सकता। दुष्कर्म केवल एक कानूनी अपराध नहीं, बल्कि किसी महिला की गरिमा और आत्मसम्मान पर गंभीर हमला होता है।समस्या तब उत्पन्न होती है जब व्यक्तिगत विवाद, असफल प्रेम संबंध, आर्थिक मतभेद या प्रतिशोध की भावना के कारण गंभीर आपराधिक धाराओं का सहारा लिया जाता है। यदि किसी निर्दोष व्यक्ति को झूठे मामले में फंसाया जाता है, तो उसका सामाजिक सम्मान, करियर, पारिवारिक जीवन और मानसिक स्वास्थ्य गहरे संकट में पड़ जाता है। वर्षों तक मुकदमे झेलने के बाद यदि वह बरी भी हो जाए, तब तक उसकी प्रतिष्ठा को जो क्षति पहुंच चुकी होती है, उसकी भरपाई संभव नहीं होती।इसलिए आवश्यकता संतुलित दृष्टिकोण की है। एक ओर वास्तविक पीड़िताओं को त्वरित और प्रभावी न्याय मिलना चाहिए, वहीं दूसरी ओर जांच एजेंसियों और न्यायिक संस्थाओं को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि कानून का दुरुपयोग न हो। केवल आरोप लग जाना ही किसी व्यक्ति को अपराधी घोषित करने का आधार नहीं हो सकता। निष्पक्ष जांच, तथ्यों का गहन परीक्षण और न्यायिक विवेक ही कानून की विश्वसनीयता बनाए रख सकते हैं।आज जरूरत इस बात की है कि समाज, पुलिस, न्यायपालिका और कानून निर्माता मिलकर इस विषय पर गंभीरता से विचार करें। महिलाओं की सुरक्षा के लिए बने कानूनों की शक्ति बनी रहे, लेकिन उनका इस्तेमाल प्रतिशोध या दबाव के हथियार के रूप में न होने पाए। न्याय का अर्थ केवल दोषियों को सजा देना नहीं, बल्कि निर्दोषों की रक्षा करना भी है। कानून की असली गरिमा तभी बनी रहेगी जब वह न केवल पीड़ित को न्याय दे, बल्कि किसी भी पक्ष के साथ अन्याय होने से भी रोके।लोकतंत्र में कानून का उद्देश्य बदला नहीं, न्याय है; और न्याय वही है जो निष्पक्ष, संतुलित और सत्य पर आधारित हो। यही सिद्धांत दुष्कर्म जैसे गंभीर अपराधों से जुड़े मामलों में भी सर्वोपरि रहना चाहिए।