तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ में कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी केवल नियमित पुलिस बल के कंधों पर ही नहीं है, बल्कि हजारों होमगार्ड (नगर सेना) जवान भी दिन-रात उसी जिम्मेदारी को निभा रहे हैं। पुलिस थानों में तैनात होमगार्ड जवान सुबह की हाजिरी से लेकर रात्रि गश्त तक लगभग हर वह कार्य कर रहे हैं, जो एक नियमित आरक्षक करता है। इसके बावजूद उन्हें न तो पुलिसकर्मियों जैसा वेतन मिलता है, न पेंशन और न ही अन्य सामाजिक सुरक्षा सुविधाएं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब काम समान है तो अधिकार और सुविधाएं अलग क्यों हैं?पुलिस थानों में आरक्षक और नगर सैनिक के कार्यों का तुलनात्मक विवरण बताता है कि दोनों की जिम्मेदारियां लगभग एक जैसी हैं। संतरी पहरा, वारंट तामील, न्यायालय संबंधी कार्य, विवेचना में सहयोग, गश्त, लाइन ऑर्डर ड्यूटी, वीआईपी सुरक्षा, सीआईडी एवं विशेष ड्यूटी, मार्ग जांच, वाहन संचालन, पुलिस रेडियो संचालन, कंप्यूटर कार्य, जनसुनवाई, चुनाव ड्यूटी, त्योहारों की सुरक्षा व्यवस्था, 100 नंबर सेवा और अपराध नियंत्रण जैसे महत्वपूर्ण कार्यों में होमगार्ड जवान नियमित रूप से अपनी सेवाएं दे रहे हैं।इतना ही नहीं, किसी भी बड़े धार्मिक आयोजन, राजनीतिक कार्यक्रम, वीआईपी दौरे, चुनाव या कानून-व्यवस्था की चुनौती के समय सबसे पहले होमगार्ड जवानों को ही मैदान में उतारा जाता है। कई बार उन्हें लगातार कई दिनों तक बिना अवकाश के ड्यूटी करनी पड़ती है। त्योहारों और रविवार जैसे अवकाश वाले दिनों में भी उनकी जिम्मेदारियां कम नहीं होतीं। इसके बावजूद उनकी आर्थिक स्थिति आज भी बेहद चिंताजनक बनी हुई है।होमगार्ड जवानों का कहना है कि उनसे जोखिमपूर्ण और जिम्मेदारीपूर्ण कार्य तो पुलिसकर्मियों की तरह लिया जाता है, लेकिन सुविधाओं के नाम पर उन्हें केवल सीमित मानदेय दिया जाता है। महंगाई के इस दौर में परिवार का भरण-पोषण करना भी उनके लिए चुनौती बनता जा रहा है। कई जवान वर्षों तक सेवा देने के बाद भी स्थायित्व और सामाजिक सुरक्षा से वंचित रह जाते हैं।इस मुद्दे को लेकर समय-समय पर देश की सर्वोच्च अदालत और विभिन्न उच्च न्यायालयों में भी चर्चा हो चुकी है। न्यायालयों ने समान कार्य के लिए उचित पारिश्रमिक और सम्मानजनक व्यवहार की आवश्यकता पर बल दिया है। इसके बावजूद छत्तीसगढ़ के हजारों होमगार्ड जवान आज भी अपनी मांगों के पूरा होने का इंतजार कर रहे हैं। उनका कहना है कि यदि सरकार उन्हें कानून-व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा मानती है तो उनके वेतनमान, सेवा शर्तों और सामाजिक सुरक्षा पर भी गंभीर निर्णय लिया जाना चाहिए।विशेषज्ञों का मानना है कि होमगार्ड व्यवस्था देश और राज्य की सुरक्षा प्रणाली का महत्वपूर्ण आधार है। सीमित संसाधनों में कार्य करने वाले ये जवान पुलिस बल पर पड़ने वाले अतिरिक्त दबाव को कम करते हैं। ऐसे में इनके वेतनमान, बीमा, स्वास्थ्य सुविधाओं, पेंशन और सेवा सुरक्षा पर सकारात्मक निर्णय न केवल इनके जीवन स्तर को बेहतर बनाएगा, बल्कि सुरक्षा व्यवस्था को भी अधिक मजबूत करेगा।वर्तमान में होमगार्ड जवानों की प्रमुख मांगों में पुलिस आरक्षकों के अनुरूप सम्मानजनक वेतनमान, नियमित सेवा संरचना, पेंशन सुविधा, स्वास्थ्य बीमा, दुर्घटना बीमा, सेवा के दौरान मृत्यु पर पर्याप्त आर्थिक सहायता तथा पदोन्नति की स्पष्ट व्यवस्था शामिल हैं। उनका कहना है कि यदि उनसे पुलिस जैसी जिम्मेदारियां ली जा रही हैं तो उन्हें पुलिसकर्मियों के समान सम्मान और सुविधाएं भी मिलनी चाहिए।छत्तीसगढ़ में हजारों होमगार्ड जवान वर्षों से राज्य की सेवा कर रहे हैं। वे अपराध नियंत्रण से लेकर आपदा प्रबंधन तक हर मोर्चे पर अपनी भूमिका निभाते हैं। ऐसे में यह मुद्दा केवल वेतन वृद्धि का नहीं, बल्कि श्रम सम्मान, सामाजिक न्याय और सुरक्षा व्यवस्था में योगदान देने वाले जवानों के अधिकारों का भी है। अब देखने वाली बात यह होगी कि राज्य सरकार और गृह विभाग इन मांगों पर कब तक गंभीर पहल करते हैं और पुलिस व्यवस्था की इस महत्वपूर्ण कड़ी को उसका उचित सम्मान और अधिकार दिला पाते हैं।