संपादक की कलम से….हम भारत माता और छत्तीसगढ़ महतारी की संतान हैं, फिर अपनी बेटियों के सम्मान, सुरक्षा और भविष्य पर मौन क्यों हैं?

Share Now

तरुण कौशिक, संपादक, सर्वव्यापी‌

मैं एक पत्रकार, एक सामाजिक कार्यकर्ता और छत्तीसगढ़ की मिट्टी का बेटा होने के नाते आज यह लेख किसी राजनीतिक लाभ, सामाजिक लोकप्रियता या व्यक्तिगत प्रसिद्धि के लिए नहीं, बल्कि आत्ममंथन और सामाजिक विमर्श के लिए लिख रहा हूं। यह लेख किसी व्यक्ति, समुदाय या महिला वर्ग के खिलाफ नहीं है, बल्कि उस सामाजिक व्यवस्था, प्रशासनिक तंत्र और हमारी सामूहिक मानसिकता पर प्रश्नचिह्न है, जिसने हमें ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है जहां हम अपनी जिम्मेदारियों से आंखें चुराकर दूसरों पर दोषारोपण करने लगे हैं।हम गर्व से कहते हैं कि हम भारत माता की संतान हैं। हम गर्व से कहते हैं कि हम छत्तीसगढ़ महतारी के बेटे-बेटियां हैं। हम अपने नेताओं को भी इसी मातृभूमि की संतान मानते हैं। चाहे छत्तीसगढ़ के प्रथम मुख्यमंत्री रहे स्वर्गीय अजीत जोगी हों, पूर्व मुख्यमंत्री एवं वर्तमान विधानसभा अध्यक्ष डॉ रमन सिंहहों, पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल हों अथवा वर्तमान मुख्यमंत्री विष्णु देव साय हों, हम सभी एक ही धरती की संतान हैं। लेकिन इस गौरव और सम्मान के बीच एक ऐसा प्रश्न खड़ा है, जिससे हम अक्सर बचने का प्रयास करते हैं—क्या हमने वास्तव में अपनी बेटियों, बहनों और महिलाओं के लिए एक सुरक्षित, सम्मानजनक और न्यायपूर्ण समाज बनाया है?आज जब हम आधुनिकता, विकास, आर्थिक प्रगति और महिला सशक्तिकरण की बातें करते हैं, तब हमें यह भी देखना होगा कि हमारे समाज में बड़ी संख्या में महिलाएं और युवतियां किन परिस्थितियों में रोजगार की तलाश करती हैं। यह विषय केवल किसी बार, क्लब या मनोरंजन उद्योग का नहीं है, बल्कि उस व्यापक सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था का है, जिसने अनेक परिवारों को ऐसी परिस्थितियों में पहुंचाया है जहां आर्थिक मजबूरी, बेरोजगारी, सामाजिक दबाव और अवसरों की कमी जीवन के कठिन निर्णयों को प्रभावित करते हैं।यहां सबसे बड़ा प्रश्न किसी महिला के चरित्र, सम्मान या व्यक्तिगत निर्णय पर नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक सामाजिक जिम्मेदारी पर है। यदि कोई महिला किसी ऐसे क्षेत्र में कार्य कर रही है जिसे समाज स्वयं सम्मानजनक दृष्टि से नहीं देखता, तो क्या केवल उस महिला को दोषी ठहराना उचित है? या फिर हमें यह पूछना चाहिए कि क्या हमने उसे पर्याप्त शिक्षा, रोजगार, सुरक्षा और सम्मानजनक अवसर प्रदान किए?समाज का एक बड़ा वर्ग अक्सर महिलाओं के कार्यक्षेत्रों पर नैतिक बहस करता है, लेकिन बहुत कम लोग इस बात पर चर्चा करते हैं कि आखिर वे परिस्थितियां क्या हैं, जो किसी व्यक्ति को किसी विशेष रोजगार क्षेत्र की ओर ले जाती हैं। क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था, हमारी आर्थिक नीतियां, हमारा सामाजिक ढांचा और हमारी राजनीतिक प्राथमिकताएं इस स्थिति के लिए जिम्मेदार नहीं हैं? क्या हम केवल परिणामों पर प्रतिक्रिया देते हैं और कारणों की अनदेखी करते हैं?आज एक और गंभीर प्रश्न प्रशासनिक व्यवस्था और कानून-व्यवस्था को लेकर भी उठता है। समय-समय पर विभिन्न राज्यों और क्षेत्रों में यह आरोप लगते रहे हैं कि मनोरंजन उद्योग, अवैध गतिविधियों, प्रशासनिक भ्रष्टाचार और अवैध वसूली के बीच एक जटिल तंत्र विकसित हो जाता है, जिसमें सबसे अधिक नुकसान कमजोर और असुरक्षित वर्गों को उठाना पड़ता है। यदि कहीं भी पुलिस, प्रशासन या किसी प्रभावशाली तंत्र द्वारा भ्रष्टाचार, अवैध वसूली या शोषण के आरोप लगते हैं, तो उनकी निष्पक्ष और पारदर्शी जांच होना लोकतंत्र की अनिवार्य आवश्यकता है।लेकिन इसके साथ ही हमें यह भी समझना होगा कि किसी भी महिला या किसी भी वर्ग के विरुद्ध सामूहिक आरोप लगाना या पूर्वाग्रह के आधार पर निर्णय देना न्यायसंगत नहीं हो सकता। किसी भी प्रकार के यौन अपराध, शोषण या उत्पीड़न के मामले में जांच, कानून, साक्ष्य और न्यायिक प्रक्रिया ही अंतिम आधार होने चाहिए। समाज को संवेदनशील होना चाहिए, लेकिन संवेदनशीलता का अर्थ तथ्यों से समझौता करना भी नहीं है।आज आवश्यकता इस बात की है कि हम कुछ असुविधाजनक लेकिन आवश्यक प्रश्नों का सामना करें। क्या हम अपनी बेटियों के लिए पर्याप्त रोजगार सृजित कर पाए हैं? क्या हमने उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में गंभीर प्रयास किए हैं? क्या हमने उनके लिए सुरक्षित कार्यस्थल सुनिश्चित किए हैं? क्या हमारी राजनीतिक व्यवस्था ने महिला सुरक्षा को केवल चुनावी मुद्दा बनाकर छोड़ दिया है? क्या हमारी प्रशासनिक व्यवस्था वास्तव में उतनी जवाबदेह है, जितना हम मानते हैं?यह भी सच है कि हमारा समाज अक्सर महिलाओं के प्रति दोहरे मापदंड अपनाता है। एक ओर हम देवी की पूजा करते हैं, दूसरी ओर वास्तविक जीवन में महिलाओं की स्वतंत्रता, सम्मान और सुरक्षा पर प्रश्न खड़े करते हैं। हम महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं, लेकिन जब कोई महिला आर्थिक संघर्ष के कारण कठिन परिस्थितियों में कार्य करती है, तो सबसे पहले समाज ही उसे कठघरे में खड़ा कर देता है। यह विरोधाभास केवल महिलाओं का नहीं, बल्कि पूरे समाज के चरित्र का प्रश्न है।मैं यह भी मानता हूं कि समाज की हर समस्या का समाधान केवल कानून से नहीं हो सकता। इसके लिए सामाजिक जागरूकता, आर्थिक सुधार, प्रशासनिक पारदर्शिता, राजनीतिक इच्छाशक्ति और पारिवारिक मूल्यों के बीच संतुलन आवश्यक है। यदि हम वास्तव में चाहते हैं कि हमारी बेटियां सुरक्षित रहें, सम्मानपूर्वक जीवन जिएं और आत्मनिर्भर बनें, तो हमें केवल भावनात्मक भाषणों से आगे बढ़कर ठोस सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन की दिशा में कार्य करना होगा।आज यह लेख लिखते समय मेरा उद्देश्य किसी व्यक्ति, महिला, परिवार, समुदाय, संस्था या शासन को कटघरे में खड़ा करना नहीं, बल्कि हम सभी को एक आईना दिखाना है। क्योंकि यदि हम स्वयं को भारत माता और छत्तीसगढ़ महतारी की संतान कहते हैं, तो हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी अपनी बेटियों, बहनों और महिलाओं के सम्मान, सुरक्षा, शिक्षा और भविष्य के प्रति है।यह समय दोषारोपण का नहीं, बल्कि आत्ममंथन का है। यह समय नफरत का नहीं, बल्कि जिम्मेदारी स्वीकार करने का है। यह समय केवल प्रश्न पूछने का नहीं, बल्कि उत्तर खोजने का भी है। क्योंकि किसी भी सभ्य समाज की वास्तविक पहचान उसकी सड़कों, इमारतों और विकास परियोजनाओं से नहीं, बल्कि इस बात से होती है कि वह अपनी महिलाओं, बच्चों और कमजोर वर्गों के साथ कैसा व्यवहार करता है।यदि हम सचमुच भारत माता और छत्तीसगढ़ महतारी की संतान होने का गौरव प्राप्त करना चाहते हैं, तो हमें सबसे पहले यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारी बेटियां भय, असुरक्षा, शोषण और सामाजिक पूर्वाग्रहों के बीच नहीं, बल्कि सम्मान, सुरक्षा, समान अवसर और न्याय के वातावरण में अपना जीवन जी सकें। यही हमारी संस्कृति की वास्तविक परीक्षा है, यही हमारी सभ्यता का वास्तविक मूल्यांकन है, और यही हमारे समाज का सबसे बड़ा आत्ममंथन भी।


Share Now

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You cannot copy content of this page

error: Content is protected !!