छत्तीसगढ़ के तीन राजनीतिक धुरंधर: जिन्होंने अलग-अलग दौर में गढ़ा राज्य का इतिहास। - Sarvavyapi छत्तीसगढ़ के तीन राजनीतिक धुरंधर: जिन्होंने अलग-अलग दौर में गढ़ा राज्य का इतिहास। - Sarvavyapi

छत्तीसगढ़ के तीन राजनीतिक धुरंधर: जिन्होंने अलग-अलग दौर में गढ़ा राज्य का इतिहास।

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तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ की राजनीति का इतिहास जब भी लिखा जाएगा, तब तीन ऐसे नेताओं का उल्लेख प्रमुखता से किया जाएगा, जिन्होंने अलग-अलग समय में अपने व्यक्तित्व, नेतृत्व क्षमता और राजनीतिक दृष्टिकोण से राज्य की राजनीति को नई दिशा दी। ये तीन नेता हैं छत्तीसगढ़ के प्रथम मुख्यमंत्री , लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे और छत्तीसगढ़िया अस्मिता को नई पहचान देने वाले । इन तीनों नेताओं ने अपने-अपने कार्यकाल में ऐसी राजनीतिक और सामाजिक छाप छोड़ी, जिसकी चर्चा आज भी प्रदेश की राजनीति में होती है।एक नवंबर 2000 को जब मध्यप्रदेश से अलग होकर छत्तीसगढ़ राज्य का गठन हुआ, तब नवगठित राज्य की बागडोर अजीत जोगी के हाथों में सौंपी गई। प्रशासनिक सेवा से राजनीति में आए अजीत जोगी अपने समय के सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते थे। वे भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी रहे और उन्होंने राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री के रूप में छत्तीसगढ़ की प्रशासनिक संरचना को स्थापित करने, नए राज्य की पहचान बनाने और विकास की आधारशिला रखने का कार्य किया। उनके समर्थकों का मानना है कि यदि प्रारंभिक दौर में अजीत जोगी जैसा मजबूत नेतृत्व नहीं मिला होता, तो नवगठित राज्य को व्यवस्थित करने में और अधिक समय लग सकता था। हालांकि उनके राजनीतिक जीवन में कई विवाद भी सामने आए, लेकिन यह भी सत्य है कि उन्होंने छत्तीसगढ़ की राजनीति को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आज वे इस दुनिया में नहीं हैं और ईश्वर की शरण में हैं, लेकिन उनकी राजनीतिक विरासत आज भी चर्चा और विमर्श का विषय बनी हुई है।वर्ष 2003 में छत्तीसगढ़ की राजनीति ने नया मोड़ लिया और भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में डॉ. रमन सिंह ने मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाली। डॉ. रमन सिंह ने लगातार तीन कार्यकाल तक लगभग पंद्रह वर्षों तक प्रदेश का नेतृत्व किया, जो छत्तीसगढ़ के राजनीतिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जाती है। उनके कार्यकाल में सार्वजनिक वितरण प्रणाली को सुदृढ़ करने, गरीबों के लिए खाद्यान्न योजनाओं को प्रभावी बनाने और राज्य में विकास कार्यों को गति देने के प्रयासों की व्यापक चर्चा हुई। समर्थकों ने उन्हें विकास पुरुष और स्थिर नेतृत्व का प्रतीक माना, जबकि विरोधियों ने नक्सलवाद, आदिवासी क्षेत्रों के विकास और प्रशासनिक निर्णयों को लेकर सवाल भी उठाए। इसके बावजूद यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि पंद्रह वर्षों तक जनता का विश्वास बनाए रखना किसी भी राजनीतिक नेतृत्व की बड़ी उपलब्धि मानी जाती है। डॉ. रमन सिंह का कार्यकाल छत्तीसगढ़ में राजनीतिक स्थिरता और प्रशासनिक निरंतरता का प्रतीक बनकर सामने आया।इसके बाद वर्ष 2018 में छत्तीसगढ़ की राजनीति में एक बार फिर परिवर्तन हुआ और भूपेश बघेल ने मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाली। उनके नेतृत्व में छत्तीसगढ़ की राजनीति में “छत्तीसगढ़िया” पहचान, स्थानीय संस्कृति, किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को केंद्र में रखने का प्रयास प्रमुखता से दिखाई दिया। भूपेश बघेल ने छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति, पारंपरिक खेलों, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और किसानों से जुड़े मुद्दों को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में स्थापित किया। उनके समर्थकों का मानना है कि उन्होंने छत्तीसगढ़ की अस्मिता और स्वाभिमान को नई पहचान दी, जबकि उनके आलोचकों ने कई नीतिगत और प्रशासनिक निर्णयों पर सवाल उठाए। फिर भी, यह स्वीकार करना होगा कि उनके कार्यकाल में छत्तीसगढ़िया संस्कृति और स्थानीय पहचान को अभूतपूर्व राजनीतिक और सामाजिक महत्व प्राप्त हुआ।यदि राजनीतिक विश्लेषण की दृष्टि से देखा जाए, तो अजीत जोगी ने छत्तीसगढ़ को प्रशासनिक आधार और राजनीतिक पहचान दी, डॉ. रमन सिंह ने उसे दीर्घकालिक स्थिरता और विकास की दिशा प्रदान की, जबकि भूपेश बघेल ने छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान और स्थानीय अस्मिता को नई ऊंचाई देने का प्रयास किया। तीनों नेताओं की कार्यशैली, राजनीतिक विचारधारा और शासन पद्धति अलग-अलग रही, लेकिन एक बात समान रही कि तीनों ने अपने-अपने दौर में छत्तीसगढ़ की राजनीति पर गहरी छाप छोड़ी।आज छत्तीसगढ़ की नई राजनीतिक पीढ़ी के सामने जब नेतृत्व, विकास, संस्कृति और जनविश्वास की चर्चा होती है, तब इन तीनों नेताओं का नाम स्वतः ही सामने आ जाता है। इतिहास यह तय करेगा कि कौन सबसे बड़ा नेता था, लेकिन यह निर्विवाद है कि अजीत जोगी, डॉ. रमन सिंह और भूपेश बघेल छत्तीसगढ़ की राजनीति के ऐसे तीन शेर रहे हैं, जिन्होंने अलग-अलग समय में राज्य की दिशा, दशा और पहचान को प्रभावित किया और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक स्थायी राजनीतिक विरासत छोड़ गए।


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