तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ के स्कूल शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। हाल के महीनों में स्थानांतरण, पदस्थापना और अतिरिक्त प्रभार से जुड़े आदेशों ने विभाग की कार्यशैली पर अनेक सवाल खड़े कर दिए हैं। शिक्षा जगत में यह चर्चा तेज है कि प्रशासनिक निर्णयों में निर्धारित प्रक्रिया और वरिष्ठता का पर्याप्त पालन नहीं किया जा रहा, जिससे विभाग की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न लग रहे हैं।सूत्रों के अनुसार, कुछ समय पहले ऐसे अधिकारी को जिला शिक्षा अधिकारी की जिम्मेदारी सौंपे जाने का मामला चर्चा में रहा, जिन्हें हाल ही में प्राचार्य पद पर पदोन्नत किया गया था। इस निर्णय को लेकर विभाग के भीतर और बाहर विभिन्न प्रकार की प्रतिक्रियाएं सामने आईं। कई शिक्षकों और अधिकारियों का कहना है कि ऐसे मामलों में अनुभव और प्रशासनिक वरिष्ठता को अधिक महत्व दिया जाना चाहिए।इसी बीच एक अन्य आदेश ने भी व्यापक चर्चा को जन्म दिया है। आदेश के अनुसार, एक शिक्षा संभाग में प्रभारी उप संचालक के रूप में कार्यरत अधिकारी को दूसरे शिक्षा संभाग के संभागीय संयुक्त संचालक का अतिरिक्त प्रभार सौंप दिया गया। इस निर्णय को लेकर प्रशासनिक हलकों में कई सवाल उठ रहे हैं। जानकारों का कहना है कि सामान्य प्रशासनिक व्यवस्था में संयुक्त संचालक स्तर के रिक्त पद का अतिरिक्त प्रभार प्रायः उसी स्तर के अधिकारी को दिया जाता है, जिससे प्रशासनिक संतुलन और पदानुक्रम बना रहे।शिक्षा विभाग से जुड़े कई जानकारों का मानना है कि यदि वास्तव में वरिष्ठ संयुक्त संचालकों की उपलब्धता थी, तो प्रभारी उप संचालक को अतिरिक्त प्रभार दिए जाने के कारणों को सार्वजनिक किया जाना चाहिए। उनका कहना है कि पारदर्शिता बनाए रखने के लिए ऐसे निर्णयों का स्पष्ट प्रशासनिक आधार सामने आना आवश्यक है।इन नियुक्तियों और अतिरिक्त प्रभार से जुड़े निर्णयों को लेकर विभाग के भीतर तरह-तरह की चर्चाएं भी चल रही हैं। कुछ लोग इन फैसलों को लेकर अनियमितता और संभावित पक्षपात की आशंका व्यक्त कर रहे हैं। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और न ही इस संबंध में किसी सक्षम जांच एजेंसी द्वारा कोई निष्कर्ष सामने आया है। इसलिए इन दावों को फिलहाल आरोपों और चर्चाओं के रूप में ही देखा जाना चाहिए।राज्य के स्कूल शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी मंत्री गजेन्द्र यादव के पास है, जबकि विभागीय सचिव डॉ कमलप्रीत सिंह प्रशासनिक व्यवस्था की निगरानी करते हैं। विभाग की हालिया कार्यप्रणाली को लेकर विपक्ष के साथ-साथ शिक्षा क्षेत्र से जुड़े लोगों के बीच भी यह चर्चा है कि निर्णय प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और नियमसम्मत बनाए जाने की आवश्यकता है।शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्थानांतरण, पदस्थापना और अतिरिक्त प्रभार जैसे महत्वपूर्ण निर्णय स्पष्ट मानकों और निर्धारित नियमों के अनुरूप लिए जाएं तथा उनके कारण सार्वजनिक किए जाएं, तो अनावश्यक विवादों और शंकाओं से बचा जा सकता है। इससे विभाग की विश्वसनीयता भी मजबूत होगी और अधिकारियों तथा कर्मचारियों का मनोबल भी बढ़ेगा।अब निगाहें राज्य सरकार पर हैं कि वह इन उठ रहे सवालों पर क्या स्पष्टीकरण देती है और भविष्य में प्रशासनिक निर्णयों को अधिक पारदर्शी एवं नियमसम्मत बनाने के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं।


