तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
किसी भी लोकतांत्रिक सरकार की सबसे बड़ी ताकत जनता का विश्वास होता है। जब मुख्यमंत्री स्वयं पारदर्शी, जवाबदेह और जनहितैषी प्रशासन देने का संकल्प लेते हैं, तब उस संकल्प को धरातल तक पहुंचाने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी प्रशासनिक तंत्र पर होती है। यदि नीतियों और योजनाओं का क्रियान्वयन अपेक्षित स्तर पर नहीं हो पाता, तो उसका प्रभाव केवल आम जनता पर ही नहीं, बल्कि सरकार की छवि पर भी पड़ता है।राज्य में इन दिनों विभिन्न विभागों की कार्यप्रणाली को लेकर जनता के बीच अनेक प्रकार की चर्चाएं सुनाई दे रही हैं। कई स्थानों पर विकास कार्यों की गति, शिकायतों के निराकरण में विलंब, पारदर्शिता की कमी तथा प्रशासनिक समन्वय को लेकर सवाल उठ रहे हैं। कुछ विभागीय अधिकारियों के बीच भी यह चर्चा है कि निर्णय प्रक्रिया और कार्यान्वयन में सुधार की आवश्यकता है। हालांकि इन चर्चाओं की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है, फिर भी ऐसी जनधारणाएं सरकार के लिए गंभीर समीक्षा का विषय बन सकती हैं।ऐसे समय में मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव सुबोध कुमार सिंह तथा सचिव पी दयानंद की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। प्रशासनिक स्तर पर उनकी जिम्मेदारी केवल फाइलों के निस्तारण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि मुख्यमंत्री की मंशा वास्तविक रूप में जनता तक पहुंचे और शासन-प्रशासन के बीच किसी प्रकार की दूरी न बनने पाए।प्रशासनिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वरिष्ठ अधिकारी समय-समय पर जिलों का भ्रमण करें, विभागीय योजनाओं की जमीनी समीक्षा करें, आम नागरिकों, जनप्रतिनिधियों तथा स्थानीय अधिकारियों से सीधे संवाद स्थापित करें, तो अनेक समस्याओं का समाधान प्रारंभिक स्तर पर ही संभव हो सकता है। इससे न केवल योजनाओं की गुणवत्ता में सुधार आएगा, बल्कि जवाबदेही भी बढ़ेगी।कई बार देखा गया है कि मुख्यमंत्री की घोषणाओं और वास्तविक क्रियान्वयन के बीच समन्वय की कमी के कारण जनता में भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। ऐसी स्थिति में असंतोष का कारण स्वयं मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि व्यवस्था की कमजोर कड़ियां बनती हैं। यदि इन कमियों का समय रहते निराकरण नहीं किया गया, तो इसका राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर प्रभाव पड़ सकता है।विशेषज्ञों का यह भी मत है कि प्रत्येक विभाग के कार्यों की नियमित समीक्षा, लंबित शिकायतों का समयबद्ध निराकरण, भ्रष्टाचार अथवा लापरवाही के मामलों में त्वरित कार्रवाई तथा जनप्रतिनिधियों और नागरिकों से प्राप्त सुझावों को गंभीरता से लेने की आवश्यकता है। इससे शासन के प्रति जनता का विश्वास और अधिक मजबूत होगा।मुख्यमंत्री की प्राथमिकता सुशासन, पारदर्शिता और संवेदनशील प्रशासन रही है। ऐसे में आवश्यकता इस बात की है कि वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी भी उसी भावना के साथ जमीनी स्तर पर सक्रिय भूमिका निभाएं। यदि प्रमुख सचिव सुबोध कुमार सिंह और सचिव पी. दयानंद स्वयं जिलों में पहुंचकर विभिन्न विभागों की वास्तविक स्थिति का प्रत्यक्ष अवलोकन करें, तो न केवल मुख्यमंत्री के प्रति जनता का भरोसा और मजबूत होगा, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था में भी नई ऊर्जा और जवाबदेही का संचार होगा।आखिरकार किसी भी सरकार की सफलता केवल नीतियां बनाने में नहीं, बल्कि उन्हें ईमानदारी और प्रभावी ढंग से धरातल तक पहुंचाने में निहित होती है। यही सुशासन की वास्तविक कसौटी है और यही वह मार्ग है, जिससे सरकार तथा जनता के बीच विश्वास का रिश्ता और अधिक सुदृढ़ हो सकता है ।


